कविता : जानता हूँ

लेखिका : डॉ सुधा गुप्ता अमृता

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घरौंदे रेत के बनाए थे 

बहुतों ने 

पर कितना मोहक था

वह घर 

जो तुमने 

घासफूस से बनाया था 

अपने कच्चे आँगन की

बाड़ी के बाहर

नीम के पेड़ के नीचे-

वहाँ हम तुम 

कुछ देर बैठते थे आँखें मीचे 

और घर की छत पर 

बैठाई थी एक कागज की चिड़िया

पंख पसारे... 


तुम आ जाती थी

देहलीज लाँघकर

याद है ना तुम्हें!

तुम कहती थीं

मेरी टाँगे बहुत लंबी हो गई हैं 

दीदी डाँटती है और 

पहना देती है लंबी फ्रॉक-

मैंने तुम्हें ध्यान से देखकर कहा था हाँ..

तुमने और भी अधिक

खींच ली थी 

अपनी मेहरून लंबी फ्रॉक-


तुम्हारी लाज को

मेरे कौतुक ने समेट लिया था अपने भीतर 

ऐसा क्यों हुआ?याद नहीं

पर तुम देहलीज लाँघकर फिर कभी नहीं आईं

जानता हूँ 

मन ने प्रतिपल 

लाँघी होगी देहरी...

(लेखिका का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)