बुफे पद्धति

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इस पद्धति की शुरुआत 17वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस में शुरू हुई थी। यह एक प्रकार की भोजन व्यवस्था है जहां विभिन्न प्रकार के व्यंजन साइड टेबल पर लगा दिए जाते हैं और लोग प्लेट में अपनी पसंद का खाना लेकर खड़े-खड़े खाते हैं। लेकिन यह पद्धति भारतीय ऋषि मुनियों की धरा व संस्कृति के अनुकूल नहीं है। भारतीय संस्कृति में जमीन पर आसन बिछाकर आलती पालती लगाकर पूर्व दिशा में मुंह करके भोजन करने की व्यवस्था है। और यह हमारे स्वास्थ्य के लिए अनुकूल भी है। बुफे पद्धति विदेशी सभ्यता के अनुरूप है वहां पर ऐसे आयोजन पर मात्र 400, 500 लोग शामिल होते हैं और विदेशी सभ्यता के अलग मानक हैं।भारत में शादी समारोह में हजार से 2000 लोगों का खाना होता है इतनी भीड़ हो जाती है कि खाना लगे हुए स्टाल पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है लंबी-लंबी लाइन लगती है धक्का मुक्की भी हो सकती है और व्यवस्था बिगड़ती है। सबसे मुख्य बात है इसके कई नुकसान होते हैं भोजन की बर्बादी होती है दोबारा स्टॉल तक न जाना पड़े इसलिए लोग पहले ही अपनी प्लेट पूरी भर लेते हैं और आधा खाना खाकर बाकी का कचरा पात्र में डालते हैं। झूठे हाथों से खाना परोसते हैं  इससे संक्रमण भी फैल सकता है। बुफे पद्धति के लिए ज्यादा भोजन तैयार करना पड़ता है ताकि पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध हो कम ना पड़े इससे खर्चा भी बढ़ता है। इसमें डिस्पोजल का इतना अधिक उपयोग होता है कि वातावरण प्रदूषित होता है। पुराने समय में भारत में पंगत लगाकर बैठकर खाना खाने की व्यवस्था थी और पत्तल दोने में खाना खाया जाता था।

खाना परोस दिया जाता था और खिलाने वाले लोग भी तैयार रहते थे। सब जरूरत के अनुसार अपने पत्तल में खाना ले लेते थे इसे खाना बर्बाद नहीं होता था।  प्रदूषण फैलने का खतरा भी नहीं था। ना संक्रमण की संभावना थी। अगर कोई पत्तलों में झूठा छोड़ देता था तो उसको अलग कर लिया जाता था और किसी जरूरतमंद को दे दिया जाता था लेकिन बुफे पद्धति में खाना कचरा पात्र में जाता है और खराब हो जाता है। वातावरण में प्लास्टिक प्रदूषण, गरीबी, महंगाई को देखते हुए इतने विशाल स्तर के आयोजनों पर रोक लगाई जाए व मेहमानों की सीमा संख्या निर्धारित कर दी जाए तो अन्न की बर्बादी होने से बच जाएगी। व्यंजन की संख्या भी कम से कम हो। अगर समाज के लोग आगे आकर वापस पंगत व्यवस्था शुरू कर दे इससे बढ़िया और कुछ हो ही नहीं सकता है। एक बार व्यवस्था शुरू हो जाएगी तो पूरा समाज इसका अनुकरण करेगा।

लेखिका : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।