तमिलनाडु विश्वविद्यालय कानून फिर अदालतों के घेरे में

लेखक : लोकपाल सेठी

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक 

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लगभग तीन महीने पूर्व सुप्रीम कोर्ट की एक दो सदस्यों वाली पीठ ने यह फैसला सुनाया था कि  राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके पास भेजे गए विधेयकों पर तीन महीने की अवधि में अपनी सहमति दे देनी चाहिए। हालाँकि  संविधान में ऐसी कोई अवधि निर्धारित नहीं की गई  है .केवल इतना लिखा हुआ है कि “उचित” समय में फैसला करना चाहिए। इसको लेकर देश के राजनीतिक और कानूनी हलकों में भारी  विवाद चला था, विशेषकर राष्ट्रपति को ऐसा निदेश दिए जाने पर। 

सारा मामला तमिलनाडु, जहां द्रमुक और कांग्रेस के मिली जुली सरकार है,द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक याचिका की सुनवाई से शुरू हुआ था। याचिका में कहा गया था कि राज्य के राज्यपाल आर एन रवि लम्बे समय से और बिना किसी कारण के लम्बे समय से विश्वविद्यालयों से संबधित 10 विधेयकों को पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे है। इन विधेयकों  के अनुसार राज्य के विश्वविद्यालयों में उप कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल को न होकर केवल राज्य सरकार के पास होगा। इन संशोधनों के जरिये इन संस्थानों में राज्यपाल की कई और शक्तियों को कम कर दिया गया था। हालाँकि संविधान के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों में उप कुलपति के नियुक्तियां राष्ट्रपति करते हैं, इसी प्रकार राज्यों के राजकीय विश्वविद्यालयों में उप कुलपतियों की नियुक्ति केवल राज्यपाल ही कर सकते है। मोटे तौर पर संविधान में केंद्रीय विश्व विद्यालयों में लगभग सभी प्रशासनिक अधिकार राष्ट्रपति के पास है जबकि राज्यों में ऐसे अधिकार केवल राज्यपालों के पास है। हाँ इन सब मामलों में  केंद्रीय सरकार राष्ट्रपति को तथा राज्यों में राज्यपाल को  राज्य सरकारें ऐसी नियुक्तियों के लेकर कुछ नामों की सिफारिश कर सकती है। 

सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने तमिलनाडु न सरकार की याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह भी कहा था कि राज्यपाल से पास लंबित सभी दस विधेयकों पर राज्यपाल की स्वतः स्वीकृति मान ली जाये। तमिलनाडु सरकार ने आनन फानन में  इन विधेयकों की गज़ट अधिसूचना जारी कर इन्हें  कानूनी रूप दे दिया। इसके साथ ही  बिना विलम्ब के 10 में से 9 विश्वविद्यालयों के उप कुलपतियों की नियुक्तियों की प्रक्रिया आरंभ कर दी। योग्य उम्मीदवारों से आवेदन मांगे गए।  पर इसी बीच मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका पेश की गयी कि जिसमें कहा गया था कि राज्य सरकार ऐसी नियुक्तियां नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता का कहना था कि सुप्रीम  कोर्ट ने केवल इन कानूनों की स्वतः स्वीकृत माने  जाने का निदेश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विधेयकों के प्रावधानों की की नहीं की थी। याचिका कर्ता का कहना था ये सभी विधेयक  संविधान सम्मत नहीं है तथा अभी भी उप कुलपतियों को नियुक्त करने का राज्यपाल का अधिकार खत्म नहीं हुआ है।  याचिका की सुनवाई करने वाली पीठ ने राज्य सरकार की इस बारे में गजट अधिसूचना को स्थगित कर दिया। यह सब कुछ मई महीने के आखरी सप्ताह में हुआ। तमिलनाडु सरकार के इस तर्क को कोर्ट ने नकार दिया गया कि याचिका कर्ता बीजेपी का नेता है तथा याचिका में राजनीति की बू आती है।   

इसको लेकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। वहां सरकार की ओर से दो याचिकाएं पेश की गईं। एक याचिका में मद्रास हाई कोर्ट के स्थगन आदेश को  हटाने के लिए थी तथा दूसरी  में कहा गया था कि इस मामले को मद्रास हाई कोर्ट की  बजाये स्वयं सुप्रीम कोर्ट सुने। सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश को रद्द करने की याचिका  को तो अस्वीकार कर दिया जबकि दूसरे मामले की सुनवाई अपने यहाँ स्थानांतरित करने की याचिका को स्वीकार कर लिया। इस पर सुनवाई कब होगी इसके बारे में अभी कोई समय निर्धारित नहीं किया गया है। 

इसी बीच राज्य के इन 10 विश्वविद्यालयों के प्रशासन को लेकर राज्य सरकार और राज्यपाल आर एन रवि में टकराव अभी जारी है। राज्यों के विश्वविद्यालयों  के कुलपति के रूप राज्यपाल ने कुछ सप्ताह पूर्व उप कुलपतियों सहित प्रशासनिक अधिकारियों की एक बैठक बुलाई थी। लेकिन ऐसा माना जाता है कि राज्य सरकार के मौखिक निदेश के चलते एक या दो को  छोड़ कर किसी भी उप कुलपति ने इस बैठक में भाग नहीं लिया। इसके चलते  राजभवन की ओर से यह कहा गया कि अगर भविष्य में कुलपति के निदेश के अवहेलना की गयी तो उनके खिलाफ सख्त कारवाही की जायेगी। 

इसी बीच कुछ राज्यों ने, जहाँ विपक्षी दलों की सरकार है,सुप्रीम कोर्ट के तीन महीने वाले फैसले को अपने यहाँ लागू करने करना तय किया। लेकिन कानूनी सलाहकारों का कहना कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल तमिलनाडु तक ही सीमित है, अन्य राज्यों में यह लागू नहीं किया सकता। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)