लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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हाल ही में इटली के शहर मिलान में गर्मियों के मौसम में पहने जाने वालों कपड़ों और जूतों और सैंडलों की एक व्यवसायिक प्रदर्शनी में आकर्षित करने के लिए जो सामान रखा गया था उसमें महाराष्ट्र की प्रसिद्ध कोल्हापुरी चप्पल से मिलते जुलते सैंडल रखे गए थे। आजकल के डिजिटल मीडिया के चलते ये चप्पल, जो वहां आने वालों को कुछ अधिक ही आकर्षित कर रही थी. जल्दी ही यह वायरल भी हो गई। इसकी कीमत भारतीय रूपये अनुसार 1 लाख 20 हज़ार रूपये बताई गई थी।
देश में कोल्हापुरी चप्पल और बिक्री का मुख्य केंद्र कोल्हापुर् है। बिना विलम्ब के यह खबर ये चप्पलें बनाने वाले कारीगरों तथा इनके व्यापार में लगे लोगों के संगठन तक पहुँच गई. उनको कहना था कि कोल्हापुर चप्पल को जियोग्राफिक इंडिकेशन (भौगोलिक पहचान ) का दर्ज़ा मिला हुआ है . इसलिए कहीं भी इसको इस नाम से बनाया नहीं जा सकता . इस संगठन के नेता जल्दी ही मुम्बई पहुँच कर राज्य के मुख्यमत्री फडनवीस से मिले . उन्होंने इन लोगों को यह आश्वासन दिया कि इटली के इस लक्ज़री फैशन कम्पनी प्रादा के खिलाफ क्या कानूनी की जा सकती है . इसके बारे वे अधिकारियों से विचार विमर्श करके तय करेंगे के इस कंपनी के खिलाफ क्या कारवाही की जा सकती है।
ऐसा बताया जाता है कि 8 वीं सदी में कोल्हापुर के कुछ चर्म हस्तशिल्प का काम करने वालों यह चप्पल बनाई थी। इसके डिजाईन में लगातार परिवर्तन होते रहे हैं। लेकिन मोटे तौर पर इसका के मूल डिजाईन बना रहा। यह मोटेऔर भूरे रंग के चमड़े से बनाई जाती है तथा इस पर पोलिश करने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर सूख भी जाये तो इसमें सरसों का तेल लगाकर नर्म कर लिया जाता है। चूँकि शुरू में ये चप्पले कोल्हापुर के कारीगर ही बनाते थे इसलिए इनका नाम कोल्हापुरी चप्पल पड़ गया। धीरे-धीर आस पास के इलाकों, सांगली शोलापुर तथा सतारा में भी ये चप्पले बनने लगीं। यह छत्रपति शिवाजी महाराज का काल था जब ये चप्पलें बहुत लोकप्रिय हुई, उस समय उनके साम्राज्य में तब के वर्तमान कर्नाटक के बेलगवी, विजयपुरा, बगलकोट तथा धारवाड़ इलाके भी आते थे। ये इलाके कोल्हापुर से अधिक दूर नहीं थे तथा यहाँ मराठी भाषी लोग ही रहते थे। धीरे-धीरे इन इलाकों में भी यह चप्पल बनने लगी। इन सब के बावजूद कोल्हापुरी चप्पलों के निर्माण और व्यापार का मुख्य केंद्र कोल्हापुर ही रहा। मोटे तौर पर लगभग 20 हज़ार परिवार इस उद्योग से जुड़े हुये है। इटली से खबर आने के बाद कर्नाटक के जिलों के उद्यमी भी बंगलुरु जा कर अधिकारियों से मिले तथा कहा कि अगर जल्द ही कोई कारवाई नहीं की गई तो उनकी रोटी रोजी पर संकट आ जायेगा।
दोनों प्रदेशों में इस उद्योग से जुड़े लोंगो का कहना है कि इटली के कंपनी को उन्हें अपने इस उत्पादन पर रोयल्टी देनी चाहिए। उधर महाराष्ट्र चैबर ऑफ़ कॉमर्स एंड अग्रीकलचर ने सीधे उस कंपनी से संपर्क किया, कम्पनी की ओर से बताया गया कि वह अभी इस चप्पल को विकसित कर रही है। प्रदर्शनी में केवल अभी इसका डिजाईन भर रखा गया है और अभी इसका उत्पादन और बिक्री शुरु नहीं की है। यह आश्वासन भी दिया गया कि समय आने पर इस चप्पल को ईजाद करने वालों को श्रेय दिया जायेगा। अगर सही समझा गया तो यह चप्पल कोल्हापुर से बनवाई जाएंगी।
चूँकि भौगोलिक पहचान का कानून केवल देश तक ही सीमित है इसलिए इसके अंतर्गत कम्पनी के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की जा सकती। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि इस चप्पल के नाम और डिजाईन को पेटेंट करवा लिया जाये ताकि इसे और कोई नहीं बना सके। अगर बनाता है तो इसके लिए रॉयल्टी देनी पड़ेगी। लेकिन यह एक लम्बी प्रक्रिया है जो केंद्र सरककर के स्तर पर ही सकती है। इस चप्पल को भौगोलिक पहचान 2019 में मिली जब सुरेश प्रभु केंद्र में वाणिज्य मंत्री थे।
इन चप्पलों का बनाने वाले कारीगरों को एक जोड़ी चप्पल के लिए 300 से 500 रुपये मिलते है। बाज़ार में इसकी कीमत 1200 से 1500 के बीच है, बड़े माल्स में इसका मूल्य बढ़कर 3000 से 5000 रूपये हो जाता है। क्योंकि इन चप्पलों को बनाने का सारा काम हाथ से होता है इसलिए इस कार्य में लगे हस्तशिल्पियों की यह शिकायत है कि उन्हें उनके उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिला रहा। हालाँकि इस उद्योग के संगठन इस कोशिश में लगे है इसके लिए हस्तशिल्पियों को लम्बा संघर्ष करना पड़ेगा। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)