आंध्र प्रदेश की राजधानी का मामला अधर में

लेखक : लोकपाल सेठी

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक 

www.daylife.page 

आंध्र प्रदेश की राजधानी का मुद्दा अधर में झूल रहा है। अगर शीघ्र ही केंद्र ने इस मुद्दे पर कोई कदम नहीं उठाया तो यह एक कानूनी मुद्दा बन जायेगा कि   क्या हैदराबाद 2 जून के बाद इस राज्य की राजधानी बना रह सकता है या नहीं। क्या चंडीगढ़, जो पिछले 50 साल से अधिक समय से पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी है, की तरह दक्षिण का यह प्रमुख और ऐतिहासिक शहर,   तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश की संयुक्त राजधानी बना रहेगा। लगभग एक दशक पूर्व जब अविभाजित आंध्र प्रदेश को बांटकर तेलंगाना बनाया गया था तब हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में आया। 

इस राज्य के विभाजन संबंधी कानून के अनुसार यह तय किया गया था कि आंध्र प्रदेश अगले दस में अपनी अलग राजधानी बनायेगा। नई राजधानी के निर्माण के लिए केंद्र राज्य को विशेष आर्थिक सहायता देगा। यह भी तय हुआ अगले दस तक वर्ष तक प्रदेश की राजधानी हैदराबाद ही रहेगी। दस साल की यह अवधि 2 जून को समाप्त हो रही है जबकि आंध्र प्रदेश की नई राजधानी को कोई अता पता भी नहीं है। अब केवल एक ही विकल्प बचा है कि हैदराबाद  को दोनों राज्यों की राजधानी बने रहने की सीमा को बढ़ा दिया जाये। ऐसी स्थिति में तेलंगाना, जहाँ अब कांग्रेस की सरकार है, इसका विरोध करेगी, जो दोनों  राज्यों के बीच तनाव का मुद्दा बन सकती है। आंध्र प्रदेश में विधान सभा के चुनाव हो चुके। वहां किस पार्टी की सरकार सत्ता में आती है इसका पता 4 जून को वोटों की गिनती बाद  ही चलेगा। 

जब नया प्रदेश तेलंगाना बना तब अविभाजित आंध्र प्रदेश में तेलगु देशम पार्टी सत्ता में थी और चंद्रबाबू नायडू राज्य के मुख्यमंत्री थे। विभाजन के बाद तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति के सरकार बनी और चंद्रशेखर राव मुख्यमंत्री बने जबकि आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू मुख्यमंत्री बने रहे। विभाजन के बाद  नायडू सरकार ने राज्य में नई बनाने के लिए ऐसे शहर की तलाश की जिसे एक राजधानी के रूप में विकसित किया जा सके। आखिर में अमरावती जिले में नई राजधानी बनाने का निर्णय किया गया। नायडू चाहते थे कि नई राजधानी का निर्माण कार्य जल्दी से जल्दी शुरू हो जाये। इसके लिए कुल मिलाकर 51, 000 करोड़ की एक योजना को अंतिम रूप दिया गया। 

चंद्रबाबू नायडू ने दावा किया था राज्य की नई राजधानी विश्व स्तरीय  होगी। परियोजना को तैयार  करने के लिए सिगापुर की एक फर्म को भरी भरकम राशि देकर यह काम दिया गया। विश्व बैंक से कुछ आर्थिक सहायता के कागज़ भी आगे बढ़ाये गए। कुल मिलाकर गोदवारी नदी के आस पास 33,000 एकड़ जमीन को अधिग्रहित किया गया। किसानों को न केवल अच्छा खासा नकद मुआवजा दिया गया बल्कि  उनको रिहायशी प्लाट देने का करार भी किया गया। निर्माण का काम तेजी से शुरू हुआ। 2019 के विधानसभा चुनावों से कुछ पहले तक सचिवालय भवन   और विधानसभा भवन काफी हद तक पूरे हो गए। लेकिन कुल मिलाकर जितना निर्माण होना चाहिए था उतना नहीं हो सका। चद्रबाबू नायडू को पूरा विश्वास था कि उनकी सरकार द्वारा किये गए कार्यों के बल उनकी पार्टी फिर सत्ता में आयेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई। 

पद संभालते ही जगन मोहन रेड्डी ने राजधानी परियोजना को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। उन्होंने कहा कि वे राज्य में प्रशासन का विकेंद्रीकरण करने के पक्ष  में हैं। इसके अंतर्गत राज्य में एक साथ तीन राजधानियां बनाई जाएगी। विधान सभा में पुराने राजधानी कानून में बदलाव कर तीन राजधानियां बनाने का  कानून पारित किया गया। इसके अंतर्गत अमरावती को राज्य की विधायिका राजधानी बनाना तय हुआ। यानि विधान सभा यहाँ से काम करेगी। प्रशासनिक राजधानी के रूप में विशाखापट्टनम को चुना गया यानी प्रशासन का मुख्यालय यह शहर होगा। न्यायपालिका, यानि जहाँ राज्य का हाई कोर्ट होगा, के लिए  कुनूर शहर को चुना गया। इस नई परियोजना सबंधी कानून को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई तथा कोर्ट ने इसे कानून का परले सिरे से ख़ारिज कर दिया। राज्य  सरकार ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती, दी जहाँ अभी यह मामला लंबित है। इसके बाद से नई योजना आगे नहीं बड़ी और नई राजधानी  की  परियोजना पर काम शुरू ही नहीं सका। अब इस मामले को लेकर केंद्र की ओर देखा जा रहा है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)