सच कहने का जोखिम तो उठाना होगा!
लेखक : वेदव्यास

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं

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हम भारत के लोग, सदियों से सत्ता और व्यवस्था की देशी-विदेशी लड़ाई लड़ते आ रहे हैं। लेकिन 1947 की आजादी के बाद और संविधान का संरक्षण पाकर आज भी हमें लग रहा है कि लोकतंत्र को मजबूत और सुरक्षित बनाए रखने के लिए सत्य के प्रयोग निरंतर और निर्भीकता से जारी रहने चाहिए। मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति का पूरा संघर्ष इस एक सत्य पर आधारित है कि सच के लिए आवाज उठाते रहो, गरीबों और बेजुबान लोगों के लिए लिखते रहो और आप जहां भी है, जैसे भी हैं, सच के साथ खड़े रहो। पूरी दुनिया आज झूठ की आंधी में फंसी हुई है क्योंकि समाज और समय, लगातार राजा और प्रजा की मानसिकता में बंटा हुआ है।

याद करिए कि हमारे त्रेता युग में भगवान राम और द्वापर युग में भगवान कृष्ण भी, रावण और कौरवों के अन्याय का प्रतिरोध करते हुए रामायण और महाभारत के नायक बने थे तो इस कलयुग में महात्मा गांधी भी सत्य और अहिंसा के प्रयोग करते हुए लोकतंत्र के महानायक बने थे। जिस तरह अमेरिका ने सत्य की खोज करते हुए एक अब्राहम लिंकन को, सोवियत संघ ने एक मार्क्स एवं लेनिन को, वियतनाम ने एक होची मिन्ह को, चीन ने एक माओतसे तुंग को,  दक्षिण अफ्रीका ने एक नेल्सन मंडेला को, क्यूबा ने एक फीडेल कास्त्रो को और बंगलादेश ने एक शेख मुजीबर रहमान को अपना मुक्तिदाता चुना था, वैसे ही मनुष्य को न्याय दिलाने की हमारी परम्परा भी प्रकृति के सच को स्थापित करने की हमारी जिद से जुड़ी हुई है। हर युग में साहित्य को भी इसीलिए मानव सभ्यता के सत्य का अन्वेशी माना गया है।

हमारे वर्तमान समय में सत्य की सर्वोच्च स्थापना का अभियान और दायित्व लेखक और पत्रकार सबसे अधिक निभा रहे हैं। 19वीं शताब्दी में आए वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास से जिस प्रेस का जन्म हुआ वही आज 21वीं शताब्दी में व्यापक मीडिया बन गया है और अब तो सोशल मीडिया का तकनीकी सूचना आंदोलन हो गया है। अपने समय की हर ताकत एक सच को साम, दाम दंड, भेद से दबाती आई है और हमारे सामंती के समाज में भी राजनीति धनपति, मीडिया और पुलिस प्रशासन का जन विरोधी गठबंधन ही आम नागरिक को सच बोलने-कहने और लिखने से अधिक रोक रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिक कुचल रहा है।

3 मई को पूरी दुनिया में प्रेस की स्वतंत्रता का दिवस मनाया जाएगा। आज भारत की प्रेस (मीडिया) दुनिया में प्रेस की आजादी बहुत दयनीय स्थिति में है और मोदी मीडिया बना हुआ है। आजादी के 76 साल बाद भी हम इस सत्य के संघर्ष को कहते हुए भयभीत है कि देश में भय, भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, गैर बराबरी, किसान, मजदूर की बदहाली और अशिक्षा, चिकित्सा अभाव और धर्म, जाति, संप्रदाय की राजनीति के पाखंड में बर्बाद हो रहा है। राजा नंगा है, ये कहने का साहस आज भारत के अधिकांश मीडिया जगत में नहीं है। 1975 का आपातकाल और 2014 के बाद की मोदी रामायण ने फिर यह साबित कर दिया है कि भारत का मीडिया पत्रकार आज सरकार और मीडिया मालिक की दोहरी गुलामी में फंसा हुआ है। उसमें जोखिम उठाने का साहस नहीं है। भारत में पत्रकार चौतरफा असुरक्षित है।

मैं भी 1960 से साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ा हुआ हूं और सच बोलने-लिखने का जुनून लेकर सत्ता व्यवस्था से पीड़ित और प्रताड़ित रहते हुए भी ऐसा अनुभव करता हूं कि 21वीं शताब्दी का वर्तमान मीडिया-पत्रकार अब कलम का सिपाही नहीं रह गया है अपितु कलम का मजदूर बन गया है। कुछ गिने-चुने लोग ही अब पत्रकारिता और मीडिया में बचे हैं जो अपना घर फूंक कर तमाशा देख रहे है। हम मशीन नहीं है और केवल मशीने के पुर्जे हैं। सरकार और सेठ की पालकी उठाते-उठाते हमें अब समय और समाज के सच को उजागर करने से डर लगता है। लेकिन फिर भी हम कहेंगे कि शब्द की विश्वसनीयता सच में ही होती है।

आने वाला समय इस बात का गवाह बनेगा कि देश की गरीब जनता का सच ही राजा के झूठ और कपट से भरी मन की बातों को हराता है और स्वतंत्रता, संविधान और लोकतंत्र को बचाता है। जब एक ठीकरी घड़ा फोड़ सकती है और एक गांधी का सत्य का प्रयोग भी सात समंदर पार से आए साम्राज्यवाद को भारत से भगा सकता है तो फिर एक कलम का सिपाही बनकर हम सामाजिक, आर्थिक अन्याय के चक्रव्यूह से अपने लोकतंत्र को क्यों नहीं बचा सकते। हिम्मत से कोई एक कंकरी तो इस ठहरे हुए तालाब में फेंके? सरकार, बाजार, प्रचार और दुखों के महासागर में कोई पत्रकार कबीर दास बनकर ये तो कहे कि मैं केवल सच के साथ हूं। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)