निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू : रमेश जोशी
व्यंग्य लेखक : रमेश जोशी 

प्रधान सम्पादक, 'विश्वा', अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए.

निवास : सीकर (राजस्थान)

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तोताराम की बातों में कोई न कोई लॉजिक होता तो जरूर है लेकिन हम उसे बहुत सीरियसली नहीं लेते क्योंकि वह लॉजिक उसके अपने हिसाब से होता है। जैसे सकारात्मक सोच वाले कहते हैं कि रुपया कमजोर नहीं हुआ बल्कि डालर मजबूत हो गया। अब गलती डालर की है तो फिर दोष रुपए को क्यों। 

वैसे तो आजकल जैसा माहौल चल रहा है उसके हिसाब से कोई किसी को सीरियसली नहीं लेता। कोई सबके खाते में 15 लाख आने की बात करता है तो नेताजी हंसने लग जाते हैं। कोई नेता कुछ भी फ्री में देता है तो लोग न तो उसे  सीरियसली लेते हैं। तभी बाद में कोई समझदार आदमी शिकायत नहीं करता।

आज जब तोताराम आया तो उसने बहुत सीरियसली पूछा- मास्टर, मुझे अयोध्या जाना चाहिए या नहीं?

हमने कहा- यदि तुम्हारी पोजीशन मोदी जी जैसी है तो तभी जाना जब भगवान राम खुद बुलाएं। निमंत्रण पत्र भेजें। और दो चार दिन बाद फोन भी करें कि तोताराम जी, याद है ना; 22 जनवरी को मेरे गृहप्रवेश में आना है। आप ही अंगुली पकड़कर मुझे गर्भगृह तक लेकर चलेंगे। वे बनारस भी तब गए थे जब माँ गंगा पीछे ही पड़ गईं । सामान्य आदमी को राम के बुलावे मतलब होता है- ऊपर जाना, मर जाना, राम नाम सत्य है। और वह उस बुलावे से बच भी नहीं सकता। वह तो कोरोना तक के बुलावे को नहीं टाल सकता, राम के बुलावे की बात तो बहुत बड़ी है।

वैसे तुझे बुलावा 'राम' ने भेजा है या 'चंपत राम' ने? राम वाले को टाला नहीं जा सकता और चंपत राम वाले का कोई भरोसा नहीं। वह निमंत्रण होते हुए भी न आने का निर्देश हो सकता है। 

देखा नहीं, आडवाणी जी और जोशी जी को कैसा निमंत्रण भेजा है ? न जाते बने, न घर बैठे बने। बिना बात बुढ़ापे में भद्द पिटी सो अलग। 

बोला- लेकिन अब तो विश्व हिन्दू परिषद वाले उनके घर जाकर निमंत्रण दे तो आए हैं। सोनिया, सीताराम येचुरी आदि को भी निमंत्रण भेजा है। 

हमने कहा- इन सभी निमंत्रणों में शुद्ध राजनीति है। आयें तो भाजपा के एजेंडे पर मुहर और न आयें तो राम-द्रोही। जिन्हें न आडवाणी जी वाला 'न आने का निमंत्रण' भेजा है वे, और जिन्हें कूटनीति के तहत निमंत्रण भेजा है वे, सब दुविधा में हैं। जो किसी श्रेणी में नहीं आते हैं वे कहते हैं- हमें चाहे बुलाओ या नहीं, हम तो जाएंगे। तू इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आता। इसलिए तू कहीं मत जा। अब तू जा, अपने घर। 

बोला- चाय पिए बिना कैसे जा सकता हूँ। 

हमने कहा- ठीक है, चाय पी ले, फिर घर चले जाना। लेकिन अयोध्या मत जाना।

बोला- लेकिन क्यों?

हमने कहा- यह चंपत राय जी नहीं चाहते और भगवान राम का भी यही मत था। 

बोला- कोई तो कारण होगा?

हमने कहा- तुम लोग राजनीति के बंदर भालू हो। जैसे पुल बनाने के लिए, लड़ने के लिए तुम्हारी जरूरत थी वैसे ही मस्जिद ढहाने के लिए, आंदोलन खड़ा करने के लिए तुम्हारी जरूरत थी। अब काम हो गया है। अब उस आंदोलन का सुफल भोगने वाले भोगेंगे। तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। अप्प दीपो भव। अपने दीये खुद बनो। तेल खरीदो, दीये जलाओ। गर्व से भर जाओ।  

रामचरितमानस में रावण विजय के बाद राम खुद बंदर-भालुओं से कहते हैं-

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू 

सुमिरेहु मोही डरपहु जनि काहू 

इसलिए हे शाखामृग तोताराम, तू चाय पीकर प्रस्थान कर। अब राम अयोध्या में गृह प्रवेश करके राज करेंगे। तू भी अपने आसपास की किसी शाखा पर उछल-कूद कर। और यदि यह संभव नहीं है तो चमगादड़ की तरह उलटा लटककर मंत्र-जाप कर। (लेखक का अपना लेखन, अध्ययन एवं अपने निजी विचार हैं)