देवयानी सरोवर (सांभर) में हजारों ने लगाई आस्था की डुबकी

देश का प्रमुख तीर्थ स्थल मां देवयानी सभी तीर्थों की नानी 

शैलेश माथुर की रिपोर्ट 

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सांभरझील (जयपुर)। सभी तीर्थों की नानी के नाम से विख्यात मां देवयानी सरोवर में कार्तिक माह के अवसर पर अब तक हजारों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को चंद्रग्रहण होने के कारण  सूतक लगने से पहले सैकड़ों की तादाद में महिला श्रद्धालुओं में भी सरोवर पर स्थित घाटों पर स्थित अनेक देवी देवताओं के प्राचीन मंदिरों में पूजा अर्चना कर अपने परिवार की खुशहाली के लिए कामना की। आज सुबह से ही यहां पर कुंड में जल्दी स्नान करने वालों का तांता लगा रहा। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की तिथि होने के महत्व को ध्यान में रखते हुए पवित्र कुंड में स्नान कर श्रद्धालुओं ने दान पुण्य कर पुण्य अर्जित किया। यहां पर अनेक जगहों से आकर लोगों ने अपनी दुकानें सजाई जहां पर खरीदारी करने वालों की अच्छी खासी भीड़ मौजूद रही।

देवयानी का इसलिए है महत्व : मां देवयानी का उल्लेख महाभारत, श्रीमद्भागवत व ब्रह्मवैवर्त पुराण सहित अनेक ग्रंथों में मिलता है। दैत्य गुरु व संजीवनी विद्या के ज्ञाता शुक्राचार्य की पुत्री मां देवयानी जल साधना कर यहीं पर जलमग्न हुई थी। माना जाता है कि कुष्ठ रोगियों के इस जल से स्नान करने के कारण उन्हें रोगों से भी मुक्ति प्राप्त होती है।  इस तीर्थ स्थल का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि मुगल सम्राट अकबर की ओर से बनवाया गया शीश महल यहीं पर स्थित है, जिसके आज भी प्रमाण मौजूद है। अनेक लोगों का मानना है कि आज भी शापित अश्वत्थामा भी यहां  कुंड में स्नान करने के लिए आते हैं। यहां अश्वत्थामा का घाट भी बना हुआ है। 

करोड़ खर्च फिर भी नहीं सुधरे हालात : 

प्राप्त जानकारी के अनुसार देवयानी सरोवर के प्राचीन वैभव व उसकी नष्ट होती आभा को बचाने के लिए 2005 से वर्ष 2018 तक केंद्र व प्रदेश सरकार की ओर से अलग-अलग चरणों में अब तक इस पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। देवयानी के घाटों पर बने विभिन्न मंदिरों के रंग रोशन, जीर्णोद्धार व अनेक विकास कार्यो पर पर्यटन और पुरातत्व विभाग की ओर से जिस प्रकार कार्य करवाया गया उस पर पूरी तरह से लीपापोती ही हुई है। करोड़ खर्च के बाद भी न तो सरोवर की आभा लौटी और न ही अनेक मंदिरों में करवाये गये जीर्णोद्धार के बाद भी उनकी कोई कायापलट हो सकी। कुल मिलाकर विभिन्न धार्मिक स्थलों पर सरकार की ओर से मंजूर किए गए करोड़ों रुपए व करवाए गए विकास कार्यों की सही प्रकार से कोई मॉनिटरिंग हुई तथा न ही क्षेत्रीय विधायक और जिम्मेदार लोगों की ओर से भी कोई आवाज उठाई गई। नतीजा पर्यटन और पुरातत्व विभाग के ठेकेदारों ने जमकर कार्यों में लीपापोती की, जिसकी वजह से हालात सरोवर के वर्ष 1984 जैसी स्थिति में पहुंच गए हैं।

सरकार की ओर से जलभराव के नहीं हुये प्रयास :  वर्ष 1984 के बाद से लगातार धीरे-धीरे सरोवर सूखता गया, अंतत  वह पूरी तरह से सपाट मैदान में बदल गया। वर्ष 2012 इसके पश्चात बारिश के पानी को यहां की युवा शक्ति ने अपने स्तर से संसाधन जुटाकर लिफ्टिंग कर इस विशाल कुंड को भरने का कारनामा किया था, उसके बावजूद भी सरकार में बैठे तकनीकी इंजीनियर इस कुंड में एक बूंद पानी तक लाने की योजना को साकार नहीं कर सके। आज भी इस कुंड में  लिफ्टिंग के जरिए भरा गया बारिश का पानी ही मौजूद है और लोग यहां पर आकर मां देवयानी के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर पालिका प्रशासन व जिम्मेदार विभाग केवल महज अपनी खानापूर्ति कर अपनी वाहवाही बटोरने में जरूर सक्रिय रहते हैं। 

इसलिए है कार्तिक पूर्णिमा का महत्व : कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान व दान करने से सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे त्रिपुरी या त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। एक और मान्यता के अनुसार,  कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान श्री हरि विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण किया था। कार्तिक पूर्णिमा तिथि भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी को बेहद प्रिय है। इस दिन कुछ कार्यों को करने से जीवन में समृद्धि आती है, तो वहीं कुछ कार्यों को करने की मनाही भी है।