नए कारिडोर के साथ जलाशयों को जीवित रखना जरूरी

राष्ट्रीय अभ्यारण्य क्षेत्रों के विकास के साथ जलाशयों का निर्माण किया जाए वही स्थानीय ग्रामीणो व युवाओं को ट्यूरिज्म (पर्यटन) से जोड़ा जाएं जिससे जैवविविधता को बढ़ावा मिलने के साथ ग्रामीण वन तथा वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए आगे आ सकें

लेखक : राम भरोस मीणा 

पर्यावरणविद् व स्वतंत्र लेखक हैं

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राष्ट्रीय बाघ अभयारण्य, पक्षी विहार, रिजर्व वन क्षेत्र वर्तमान परिस्थितियों में चारों तरफ़ से सिमटें से जा रहे हैं कहीं आबादी का दबाव बना है, कहीं खनन, फार्महाउस, औद्योगिक इकाईयों, परिवहन जैसे अनेकों दबाव वन वन्य जीवों तथा वन क्षेत्रों को समेटते दिखाई दे रहे हैं, जिसके प्रभाव से वन क्षेत्रों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव दिखाई देने लगा है। वन क्षेत्रो से अनेकों प्रजातियों के वन्य जीवों पक्षियों की संख्या कम होने के साथ अपने अनुकूल वातावरण ढूंढते हुए एक अभ्यारण्य से दुसरे की तरफ़ बड़ते जा रहें हैं इसका प्रभाव राजस्थान के पुर्वी इलाके में आने वाले पक्षियों की संख्या में आई कमी के साथ सरिस्का में दिखाई देने लगीं है जिससे  जैवविविधता पर इसका प्रभाव सीधा दिखाई देने लगा है।

बाघ विहीन हुए सरिस्का अभयारण्य में पुनः बाघों के बड़ते कुनबे को देख कर एक तरफ़ खुशी की लहर दौड़ रही है वहीं युवा बाघों के लिए एक अलग टेरिटरी की तलाश में परियोजना क्षेत्र से बहार निकलना बड़ी चिंता के साथ उन्हें सुरक्षित रखना चुनौती है, ऐसे में इनके लिए वन क्षेत्रों का विकास तथा वन्य जीवों के अनुकूल वातावरण होना बहुत जरूरी है। सरिस्का में 31 बाघ, 4 भालू, दर्जनों भर बघेरे, चीतल सांभर जंगली सुअर के साथ दर्जनों प्रकार के वन्य जीव तथा 250 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां यहां बसेरा करतीं हैं साथ ही सर्दी के मौसम में 50  से 60 प्रजातियो के प्रवासी पक्षी भी यहां आकर निवास करने के साथ अपना प्रजनन कर कुनबा बढ़ाने में सफ़ल होते हैं। 

सरिस्का वन क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सामिल होने के कारण यहां चारों तरफ़ आबादी क्षेत्र, कृषि फार्म हाउस का दबाव बना है वहीं वनों के अवैध कटान बड़े हैं, खनन की मांगें उठने लगीं है जो वन्य जीवों व पक्षियों के लिए घातक है, वन क्षेत्र के चारों ओर दर्जनों बांध बने हुए हैं जयसमंद जैसे एतिहासिक महत्व के बाध जो अतिक्रमण के चलते हर वर्ष पानी नहीं पहुंचने के चलते पिछले दो दशकों से खाली नजर आता वहीं यहां कलरव चहचहाहट करने वाले पक्षियों की संख्या नगण्य हो गई। 

वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए जिस प्रकार से नए कारिडोर की जरूरत उनके आवास के लिए होती है उसी तरह जलाशयों को सुरक्षित रखना आवश्यक है जिससे जंगली जानवरों व पक्षियों के लिए पेयजल आपूर्ति हो सकें वहीं मौसम के अनुसार पक्षियों को वातावरण व उनके प्रजनन के अनुकूल परिस्थितियां बनी रह सकें। सरिस्का में बाघों के लिए अलवर वन मण्डल ने वन क्षेत्र से बहार बाघों के लिए नए कोरिडोर तैयार कर अलवर,जिंदोली, थानागाजी, सरिस्का के साथ जयपुर विराटनगर के जंगलों से जोड़ने पर  क्षेत्र के नए जंगलों का जुड़ाव जमवारामगढ़ के जंगलों से होगा जो बहुत जरूरी है वहीं थानागाजी विधान सभा क्षेत्र के बल्लूवास प्रतापगढ़ थानागाजी गुढ़ा चुरानी में नए कोरिडोर तैयार करने के साथ अलवर ज़िले में 28 लाख नए पौधे लगाने की योजना प्रकाशित हुई लेकिन कहीं भी वन्य जीवों व पक्षियों के लिए जल व्यवस्था को जगह नहीं मिल सकी ऐसे में वन्य जीवों को वन क्षेत्र तक सीमित रखना बड़ा मुश्किल होगा।

सरिस्का राष्ट्रीय बाघ परियोजना की महत्वकांक्षा, उपयोगिता, आवश्यकता के साथ नष्ट होती जैवविविधता, बड़ते ग्लोबल वार्मिंग, पोल्यूशन कों ध्यान में रखते हुए यहां खनन पूर्ण रूप से बन्द किया जाएं वहीं वन क्षेत्र की खाली भूमि, गोचर , सिवायचक पर वन तैयार करना जितना आवश्यक है उतने ही आवश्यक ग्रामीण ट्यूरिज्म को बढ़ावा देने तथा जलाशयों का निर्माण व पुराने जलाशयों को संरक्षण देना बहुत आवश्यक है जिससे ग्राउंड वाटर लेवल उठने के साथ प्राकृतिक वनस्पतियों को बढ़ावा मिल सकें वहीं स्थानीय ग्रामीण किसानों युवाओं द्वारा सहयोग प्राप्त होता रहें। अतः आवश्यकता है कि नए कोरिडोर तैयार करने कै साथ जलाशयों कों जीवित रखना व ग्रामीण ट्यूरिज्म के माध्यम से किसानों व युवाओं को जोड़ा जाएं। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)