नरेद्र मोदी की नज़रें दक्षिण की ओर
लेखक : लोकपाल सेठी

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक 

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हाल ही में हुए पांच राज्यों की विधान सभाओं के चुनावों में बीजेपी उत्तर के तीन हिंदी भाषी राज्यों में सत्ता में आई थी। दक्षिण में तेलंगाना ऐसा राज्य था   जहाँ कांग्रेस जीतने में सफल रही। इसके लगभग 6 महीने पूर्व कांग्रेस दक्षिण के ही एक राज्य कर्नाटक में बीजेपी को हटाकर सत्ता में लौटने में सफल रही थी। इसके साथ ही राजनीतिक हलको में उत्तर बनाम दक्षिण की बहस शुरू हो गई। इस बहस का लाबोलबाब यह था कि आने वाले लोकसभा चुनावों में  उत्तर भारत में जहाँ बीजेपी का दबदबा होगा वहां दक्षिण में कांग्रेस की तूती बोलेगी। लेकिन बीजेपी के नज़दीक समझे जाने वाले जानकारों का कहना है कि     बीजेपी और इसके मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत काफी समय से एक ऐसी योजना पर काम कर रहा है जिससे उनका यहाँ प्रभाव बढ़ सके। इससे  तमिलनाडु की लगभग सभी पार्टियों के द्रविड़ अजेंडे को आगे बढ़ने से रोका जा सके। संघ शुरू से ही इस राज्य में सनातन धर्म को आगे बढ़ाने लगा है। 

संघ के इसी अजेंडे को केंद्र की बीजेपी सरकार अपनी तरीके से आगे बढ़ा है। अगर इतिहास को  खंगाला जाये तो यह बात सामने आती है कि इस समय था जब बनारस या काशी में सबसे अधिक तीर्थ यात्रा दक्षिण के राज्यों से आते थे। दक्षिण के राजाओं ने अपने यहाँ से काशी जाने वाले तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए काशी तक के सड़क मार्ग पर जगह विश्राम गृह बनवाये थे। ऐसे विश्राम गृह ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाल से कुछ समय पहले तक थे। केवल इतना ही नहीं कई राज्यों काशी महादेव मंदिर की तर्ज पर अपने यहाँ वैसे ही शिव मंदिर भी बनवाये थे। दक्षिण, विशेषकर तमिलनाडु के ब्रहामिन परिवार अपने  बच्चों को संस्कृत सीखने के लिए काशी भेजते थे। राष्ट्रीय कवि और तमिलभाषी सुब्रमनियम भारती अपने जीवन काल में काशी में ही काशी में रहने लगे थे।    आज भे उनके नाम से काशी का एक मौहल्ला है जहाँ काफी संख्या में तमिल भाषी लोग रहते है। 

उत्तर और दक्षिण के इन पुराने संबधो को फिर जोड़ने की एक योजना केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्रालय ने पिछले वर्ष शुरू की थी। जिसके अंतर्गत तमिलनाडु से अलग जत्थों को काशी में लाया गया था। ये जत्थे लगभग के एक पखवाडा यहाँ रहे थे। इस योजना का नाम काशी तमिल संगम रखा गया था। इसके बाद से यहाँ दक्षिण से यहाँ आने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या में इज़फा होने लगा। इसके दूसरे संस्करण में अब काशी में इस महीने के मध्य से जत्थे फिर लाये जा रहे है। पहले जत्थे का स्वागत करने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यहाँ आये थे। वे बनारस से ही सांसद है। इस बार इसमें एक नई बात जोड़ी गयी।  

इस बार इस संगम में तमिलनाडु से लगभग 150 धर्म गुरुयों को भी लाया गया। दक्षिण को उत्तर से जोड़ने के लिए नए लोकसभा भवन में राजदंड के रूप में स्थापित करने के लिए पवित्र ऐतिहासिक चिन्ह सांगोल तमिलनाडु से ही लाया गया था। लोकसभा भवन में इसकी स्थापना के लिए एक दर्जन धर्म गुरुयों को भी वही से लाया गया था राज्य में कोयम्बतूर एक ऐसा राज्य है जहाँ दो तीन सदी पहले गुजरात के सौराष्ट्र इलाके से बड़ी संख्या गुजराती यहाँ बस गए थी।  अब वे लगभग तमिल बन गए है। लेकिन उनको यह पता है वे मूल रूप से गुजरात के ही है। ऐसे परिवारों को फिर से अपनी जड़ो से जोड़ने के लिए केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्रालय ने काशी तमिल संगमम के तर्ज़ पर यहाँ के गुजराती मूल के परिवारों को जत्थों को गुजरात में लाया गया था। कर्नाटक कैडेट के पूर्व आई  पी एस अधिकारी और अब राज्य बीजेपी के अध्यक्ष अन्नामलाई इस जिले से आते है। 

नरेन्द्र मोदी ने 2014 में अपना पहला लोकसभा चुनाव दो स्थानों-अहमदाबाद और बनारस से लड़ा था। बाद में उन्होंने अहमदाबाद सीट छोड़ दी थी। 2019 का चुनाव उन्होंने केवल बनारस से लड़ा था। दक्षिण राज्यों के बीजेपी नेताओं में कुछ समय से यह चर्चा चल रही है कि मोदी अगला चुनाव फिर दो स्थानों से लड़ सकते है, जिनमें बनारस के अलावा दूसरा स्थान तमिलनाडु हो सकता है। इसके लिए कोयम्बतूर के अलावा कन्याकुमारी का नाम चर्चा में है। जब प्रधानमंत्री बनारस में काशी संगमम के लिए आये थे तब उन्होंने काशी–कन्याकुमारी के बीच चलने वाली नई गाड़ी को हरी झंडी दिखाई थी। इसी राज्य के तीसरे स्थान, जहाँ से मोदी चुनाव लड़ सकते है, का नाम रामानाथाम्पुरम-रामेश्वराम, का नाम भी इस चर्चा से जुडा हुआ है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)