बदतर होती जयपुर की नगरीय व्यवस्था को कैसे सुधारा जाए : डा.सत्यनारायण सिंह

लेखक : डा.सत्यनारायण सिंह

लेखक रिटायर्ड आई.ए.एस. अधिकारी हैं 

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जयपुर नगर की बिगडती नगरीय व्यवस्था को सुधारने के संबंध मे राजस्थान के मुख्यमंत्री व नगरीय विकास मंत्री ने स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेते हुए जेडीए व नगर निगम से जबाब तलब किया है कि क्योंकर जयपुर में सफाई व्यवस्था, मलबा उठाने की व्यवस्था, आवारा पशुओं का सड़क पर खुले आम बैठे रहना, घूमने पर कार्यवाही नहीं हो रही है? राजस्थान सरकार व उच्च न्यायालय ने बिगडती नगरीय व्यवस्था को सुधारने के संबंध मे अनेक बार निर्देश प्रदान किये। मानिटरिंग कमेटी गठित की, उच्चतम न्यायालय ने भी सेवा निवृत न्यायाधिपतियों की उच्चाधिकार समिति गठित की जिसने अपनी सिफारशें जे.डी.ए. व निगम को भेजी हैं, परन्तु हालात में अपेक्षित सुधार नही हुआ। प्रतिदिन समाचार पत्रों में अतिक्रमण एवं बेतरतीब निर्माण, आवारा पशुओं एवं गंदगी के ढेर, अव्यवस्थित यातायात, ऐतिहासिक स्थलों की दुर्दशा, सफाई अव्यवस्था, अस्पतालों, नल बिजली की दुर्व्यवस्था से संबंधित हालात की खबरे व फोटो लगातार छप रही हैं जिससे स्पष्ट है कि नगरीय व्यवस्था सुधार में कोई अंतर नही आ रहा है बल्कि हालात सुधरने के बजाय बिगडते जा रहे है।

प्रतिदिन घोषणाएं की जा रही है। विकास कार्यो के लिए करोड़ों रूपया स्वीकृत किये गये। इस अव्यवस्था को रोकने के निर्णय किये गये। नवीन व्यवस्था से शहर स्वर्ग बन जायगा परन्तु सभी ‘‘सिफर’’। नगरीय व्यवस्था व विकास से संबंधित विभागों के सामने न तो कोई चैलेंज है न ही कोई कमिटमेंट और न ही कोई कंट्रोल की व्यवस्था और न कोई जिम्मेदारी है। बडे अधिकारी तो इच्छा होने पर भी कुछ कर गुजरने की स्थिति में नहीं है। कहीं चुने हुये प्रतिनिधि रोडा बनकर खडे हो जाते हैं तो कही नीचे के क्रियान्विति करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की अकर्मण्यता आडे आ जाती है। जो रास्ते अख्तियार किये जाते हैं वे भी अस्थाई होते हैं। न सफाई कर्मी कार्य करते हैं, न उन्हें साधन, सुविधाएं व नवीन तकनीक का सामान व औजारें मुहैय्या कराये जाते हैं। 

नगरीय व्यवस्था में एक दिन के सुधार से स्थिति नही सुधारी जा सकती। जब तक लगातार चलती सतत प्रक्रिया के तहत, स्पष्ट एक्शन प्लान नही बने, सरकार के निर्देशों की क्रियान्विति नही हो सकती। निर्णय लागू नही हो पाते और लागू करने पर भी उन पर कोई कार्यवाही नही होती। किसी का उत्तरदायित्व निर्धारित नही, केवल कागजी कार्यवाही एवं प्रचारात्मक कार्यवाही चलती रहती है।

नगर के भीतरी भाग में नये निर्माणों पर शीघ्र मारिटोरियम लागू किया जाये एवं चारदीवारी मे आवासीय व व्यवसायिक निर्माण किसी भी स्तर पर नहीं बढने दिया जाय। वास्तुकला, अलाइन्मेंट, स्काई लाइन के विपरीत तो किसी भी सूरत में निर्माण नहीं बने। राजस्थान उच्च न्यायालय ने मुझेे मानिटरिंग कमेटी में  सम्मिलित किया था मानिटरिंग कमेटी की मीटिंग में मैंने 5 महत्वपूर्ण मुद्दो पर ध्यान आकर्षित किया था। सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है- शहर के भीतरी इलाकों में बढती आबादी का घनत्व कम करना और इसके लिए यह आवश्यक होगा कि एक लिबरल हाउसिंग नीति बनाकर उचित साईज के आवासीय प्लाट, मध्यम श्रेणी एवं अल्प आय वाले परिवारों को नगर के बाहर एक रीजनल प्लान बनाकर साधारण एवं न्यूनतम मूल्य पर दिये जायें। जयपुर की बसावट कूंचा उपाड व न्यूक्लियस थ्योरी के आधार पर हुई थी। 

द्वितीय सुझाव के अनुसार नगर के बाहर अधिक से अधिक व्यापारिक मार्केट व केन्द्र्रों का निर्माण हो। छोटे छोटे दुकानदारों, व्यवसायियों तथा बेरोजगारों को स्थान दिये जाय। सस्ती दरों पर, वर्तमान बाजार दरों से नगर के भीतर रहने वालों को दुकान के बदले दुकान की नीति पर कम दर पर, दुकाने आवंटित की जाये जिससे भीतरी शहर में बढती व्यापारिक गतिविधियों का बढना कम हो। व्यापारिक गतिविधियां बढने से भारी, अर्धभारी व व्यापारिक वाहनों का आवागमन भी बढ रहा है। ट्रेफिक की समस्या कन्ट्रोल के बाहर होती जा रही है।

तृतीय सुझाव के अनुसार बढती वाहनों की संख्या को देखते हुए, उनके प्रवेश व ठहराव, जाम लगने की समस्या कम किये जाने हेतु एक तरफा आवागमन हो, मुख्य बाजारों मे वाहनों का ठहराव कम हो, धीमी गति से चलने वाले एवं तेजी से चलने वाले वाहनों को पृथक किया जाये, नो एंट्री जोन बने, पार्किंग कम समय के लिए हो, सडकों पर अल्टरनेट डेज पर पार्किंग हो। किसी भी सूरत में राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक जुलूस रेलियों, सभाओं व प्रदर्शनियों की इजाजत नहीं दी जाय। पार्किंग स्थलों को नीलाम किया जाकर उनको आय को स्त्रोत नहीं बनाया जाये। अधिक पार्किंग फीस भी निर्धारित स्थान पर पार्किंग को अवरुद्ध करती है। इसलिए पार्किंग फीस कम हो।

जब तक शहर के भीतरी भागोन में आबादी के घनत्व को बढने से नहीं रोका जायेगा अथावा कम नही किया जायेगा, व्यापारिक गतिविधियां कम नही की जायेगी अथवा बढने से रोकी नही जायेंगी, वाहनों का ठहराव व पार्किंग पर रोक नही होगी तथा सुचारु पब्लिक ट्रांसपोर्ट नही होगा तब तक स्थाई समाधान संभव नही होगा। चाहे कुछ भी किया जाये स्थिति बिगडेगी ही। यातायात कंट्रोल के लिए दंडनात्मक तरीके के बजाय समझाइस व ट्रेफिक-सेंस जागृत करने पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।

चौथा सुझाव था, विकसित कॉलोनियों की खाली पडी सरकारी भूमि का बेचान बंद करना आवश्यक है। पुरानी अनुपयोगी इमारतों को हटाकर तौडा जाकर स्थान खाली कराये जायें। खुली सरकारी भूमि व पुराने भवनों के स्थान पर सुविधा केन्द्र, पार्किंग स्थल स्थापित किये जायें। विकसित कॉलोनियों में बहुमंजिली आवासीय व व्यवसायिक ईमारतें बनाना निषेध किया जाय आवासीय इमारतो व भवनों में बडी व्यापारिक गतिविधि व व्यवसाय पर रोक लगे। इससे पानी, बजली, सीवरेज, यातायात, सफाई, पर्यावरणीय समस्यायें बढ़ रही हैं। खुला आवागमन व सुचारु पार्किंग व्यवस्था होने पर ही यह ज्ञात होगा कि क्षेत्र के वातावरण व पर्यावरण पर कितना विपरित असर पड़ रहा है। कुछ स्थानों पर अनावश्यक यातायात टर्मिनल बनाये गये हैं उन्हें पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम की दृष्टि से समाप्त किया जाना आवश्यक हैं। व्यापारिक संगठनों को साथ लेकर कुछ क्षेत्र, कुछ बाजार व कुछ मार्गाे में आदर्श व्यवस्था हो जिससे लोगों में एक जागृति व प्रभावशाली विचार व चेतना बढे और वे क्षेत्र उदाहरण  के रुप में सामने आये।

पांचवा सुझाव था, मुख्य सड़कों, रास्तों, गलियों की सड़के तुरंत दुरूस्त हो, फुटपाथ खाली कराये जायें। बरामदों, फुटपाथ व सड़क पर अतिक्रमण बरदास्त नहीं किया जाय। बाजारों से फैक्ट्रियां, वर्कशाप, रहवास प्रतिबंधित किया जाय। चारदीवारी के विभिन्न दरवाजों को, बढते यातायात एवं आवागमन को सुचारु व सुलभ बनाने की दृष्टि से, बडा करना आवश्यक है अथवा उनके पास ही नवीन गेटों के निर्माण की आवश्यकता है। यातायात नियमों का सख्ती से पालन हो, ओवरलोडिंग, लेन तोड़ने पर, अधिक स्पीड पर सख्त कार्यवाही हो। मिनी बसों, आवारा पशुओं, फुटकर दुकानदारों की समस्याएं स्पष्ट एक्शन प्लान बनाकर दूर की जा सकती हैं। यह आश्चर्य है कि जो सरकार व प्रशासन बरामदें खाली कराने में सक्षम है वही सरकार आवारा पशुओं, मिनी बसों व अतिक्रमणों को हटाने पर पूर्णतया असफल रहे।

यह दुःखद स्थिति है कि उच्चतम न्यायालय को तालकटोरा, जलमहल, रामगढ़, मावठा, अन्य तालाब, बाबडियां, जलस्त्रोतों के संबंध में व आवारा पशुओं, अतिक्रमण, अवैध निर्माण के संबंध में बार-बार अफसरों को बुलाकर लताड लगानी पड़े, रिपोर्ट मंगानी पड़े और फिर भी वही ढांक के तीन पात, व्यवस्था में सुधार नहीं हो। शहर के हालात में राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार तभी सुधार होगें जब कोई स्पष्ट एक्शन प्लान बनाया जाये तथा पूरे चैलेँज व कंट्रोल के साथ उसकी क्रियान्विति की जाये। राजनैतिक व प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ निर्णय लेकर दृढ निश्चय के साथ क्रियांवित किया जाय। शहरी प्रबन्धन एक दिन के लिए नही होता अपितु एक निरन्तर चलने वाली प्रबन्धन व्यवस्था है। प्रतिदिन वही समस्याएं जिनको हम समाप्त करना चाहते है उपस्थित होती रहती है, बनती रहती है एंव बढती रहती है। प्रशासन सोता रहता है, जनता इसी मे जीने को आदी होती जा रही है। इसमें सुधार आवश्यक है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)