बिगाड़ी जलवायु तो बिगड़ रहा स्वास्थ्य : डा. सत्यनारायण सिंह

लेखक : डा. सत्यनारायण सिंह

लेखक रिटायर्ड आई.ए.एस. अधिकारी हैं 

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पर्यावरण का अर्थ है ‘‘वह आवरण तो हमें चारों ओर से घेरे हुए है और उसमें मनुष्य तथा उसका समस्त परिवेश समाहित है।’’ पर्यावरण सरंक्षण पर विभिन्न स्तरों पर समय-समय पर संगोष्ठियां, सम्मेलन, घोषणाएं होती रही है परन्तु सार्थक प्रयासों का अभाव बना हुआ है।

विदेशी शासनकाल से ही भारत में वनों का कटाव प्रारंभ हो गया था। घनी आबादी, कच्ची बस्तियां, गन्दगी, वाहनों से शहरी क्षेत्रों में तेजी से प्रदूषण बढ़ रहा है। शहरी गंदी बस्तियों में नगर निगमों की अकर्मण्यता एवं निष्क्रियता से सफाई, शौच निकास, स्वच्छ पानी की व्यवस्था सोचनीय बनती जा रही है। प्रदूषित पानी के सेवन व पानी की कमी से बीमारियां बढ़ रही है, स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। उद्योगों से विषाक्त पदार्थो के बाहर आने के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या ने गंभीर रूप धारण कर लिया है।

बेहतर जीवन सुविधाएं प्रदान करने की इच्छा से निर्माण की गति तेज हुई परन्तु प्रकृति की शुद्धता के स्तर में गिरावट आई। जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावशाली नियंत्रण नहीं रहा, इसके फलस्वरूप भूमि की गुणवत्ता समाप्त हुई, वायु एवं जल प्रदूषण हुआ एवं प्रदूषण से जुड़ी हुई बीमारियों की संख्या बढ़ती गई। अनेक प्रकार के पशु, पक्षी एवं वनस्पतियां विलुप्त होती जा रही है। भौतिक एवं औद्योगिक प्रगति जहां आवश्यक है, वहां पर्यावरण संरक्षक भी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है, इसे ध्यान में रखकर ही विकास की ओर बढ़ना आवश्यक है। बढ़ती जनसंख्या और विश्व अर्थव्यवस्था के विकास के लिए शुरू की गई विकास योजनाओं से मानव केन्द्रित ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में एक अन्तर्निहित संबंध है।

बढ़ती हुई जनसंख्या से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अनियोजित तरीके से हो रहा है। बढ़ती आबादी में गरीबी बढ़ रही है, संसाधन घटते जा रहे है व पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है। पर्यावरण का मतलब वन्य जीव की रक्षा, जनसंख्या विस्फोट, शहरीकरण, औद्योगिकरण तक ही सीमित हो गया है जबकि शुद्व जल आपूर्ति, स्वच्छ हवा व सफाई व्यवस्था पर्यावरण बनाये रखने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सफाई व्यवस्था पर समुचित ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है। तापमान के उतार चढ़ाव से दिल व सांस संबंधी रोगों, दमा, डेंगू, मलेरिया बढ़ सकता है। हवा में जहर से सांस संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से बीमारियां बढ़ेगी।

नगरों तथा उद्योगों से निष्कासित ठोस ईंधन, भवन निर्माण सामग्री, पालीथीन, धातु अवशेष का उपयुक्त शोधन नहीं किया जा रहा है। करोड़ों लोग संक्रमण के शिकार हो रहे हैं। प्रदूषण का सामाजिक, आर्थिक विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शहरों व कस्बों की गलियों एवं बस्तियों में कूडा-करकट, गंदा पानी, मल-मूत्र के गड्डों से उडती दुर्गंध, उनमें पैदा होने वाले कीटाणु, खुले में बच्चों द्वारा मल-मूत्र का परित्याग, शौचालयों की अमानवीय एवं अस्वास्थ्यकर व्यवस्था अत्यन्त दयनीय है जिससे वायु प्रदूषण के साथ जल व ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ रहा है। मल निक्षेपण की कोई सुचारू व्यवस्था नहीं है, वातावरण दूषित होता जा रहा है। मल से विभिन्न संक्रामक रोग टाईफाईड, आंत्रशोध, पेचिश, हैजा, पोलियों, यकृत रोग आदि बढ़ रहे है। नगरों की सफाई को पर्यावरण के साथ जोड़कर नहीं देखा जा रहा हैं। उद्योगों से विषाक्त पदार्थो के बाहर आने के कारण पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा हैं।

उन्नत सफाई प्रबंध गांवों व कस्बों में, गलियों में, नालियों व कचरागृहों की सफाई, सैफ्टिक शौचालय, सार्वजनिक स्थानों पर बने सार्वजनिक शौचालय व मूत्रालय की गंदगी शहरों के पर्यावरण को दूषित करती रहती है। अच्छा सार्वजनिक शौचालय ही इतिश्री नहीं है। उनकी उचित सफाई, रख रखाव पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

नगर निगम व नगर स्वास्थ्य संस्थाओं का यह कर्तव्य है कि वह अनावश्यक फिजूलखर्ची को रोक कर सैकेण्डरी व अनावश्यक कामों पर व्यय करने की बजाय, वह अपनी प्राथमिक डयूटी निभाये। सौन्दर्यकरण, रोशनी, रंग रोगन, जल के फव्वारें, चौराहों का निर्माण, सम्मेलनों के आयोजन में धन व समय बरबाद करने की बजाय पूरी शक्ति व साधनों के साथ सफाई कार्यो पर ही जुटें। मल मूत्र व कूडा करकट एकत्रित नहीं हो ताकि गंदगी नहीं हो, सड़कें टूटी फूटी न हो साफ सुधरी हो, यह सुनिश्चित करना जरूरी है।

जन चेतना जागृत करना अति आवश्यक है। सफाई रखने के संबंध में एक विस्तृत व स्पष्ट प्रोग्राम बनाकर आन्दोलनात्मक तरीके से उसे लागू करना जरूरी है। केवल फोटो खिंचवाकर छपाना या टीवी पर अपनी सूरतें दिखाना पर्याप्त नहीं है, एक असहनीय मजाक है। लोगों को सफाई, स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करना होगा, उनको जिम्मेदारी का अहसास कराना होगा। पर्यावरण संरक्षण के लिए पर्यावरण सुरक्षा भी अनिवार्य करनी होगी। महिलाओं एवं बच्चों को सफाई व स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करना होगा।

गरीबी पहले ग्रामीण इलाकों की समस्या थी, आज शहरी समस्या भी बन रही है, कच्ची बस्तियां बढ़ रही है। जब हम इन बातों पर ध्यान देंगे तो पर्यावरण पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा। सामाजिक और आर्थिक विकास में समरसता रखकर ही विकास के कार्यक्रम बनाने होंगे।

शुद्ध पर्यावरण ही हमें स्वस्थ रख सकता है परन्तु ऐसी जटिल समस्या से जुड़ने के लिए सरकारें सबसे कम इच्छुक है। समस्या की विकरालता बढ़ती जा रही है। साफ सुथरा पर्यावरण उपलब्ध कराने के लिए सफाई प्रबन्ध की व्यवस्था तो अनिवार्य है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)