तेलंगाना में विधायकों की खरीद फरोख्त!

लेखक : लोकपाल सेठी

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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अभी तक  केवल आम आदमी पार्टी ही बीजेपी पर दिल्ली और पंजाब में उनके विधायकों को पैसे से खरीदने का आरोप लगा रही थी। अब इसमें दक्षिण के  एक राज्य तेलंगाना के सत्तारूढ़ दल भारत राष्ट्र समिति, जो  अब तक तेलंगाना राष्ट्र समिति के नाम से जाना जाता था, के नेताओं ने भी बीजेपी पर उनके विधायकों को खरीदने का आरोप लगाया है। इसके नेताओं को कहना है कि बीजेपी उनके विधायकों का खरीदने के लिए भारी राशि खर्च कर रही है। बीजेपी  ने इन आरोपों को परले सिरे से ख़ारिज कर दिया है और कहा है कि सत्तारूढ़ दल राज्य में हुए एक विधान सभा उप चुनाव से पूर्व यह झूठ फ़ैला रही थी ताकि चुनाव प्रभावित हो जाये। 

हालाँकि आपने केवल उनके विधायक खरीदने का आरोप लगाया पर उसके नेताओं न तो कोई सबूत दिये है और ना ही ऐसा कोई मामला पुलिस में दर्ज करवाया। लेकिन तेलंगाना के सत्तारूढ़ दल ने  पुलिस में मामला दर्ज करवाया और मामले की जाँच भी चल रही है। इस मामले में  अब तक तीन लोगों को गरिफ्तार किया गया है। ये तीनों  बीजेपी से सीधे तो नहीं जुड़े हुए है बस बीजेपी के नज़दीक बताये जाते है। सत्तारूढ़ दल ने एक विडिओ क्लिप भी जारी  किया है जिसमें ये तीन लोग भारत राष्ट्र समिति के चार विधायकों को पाला बदलने के किये 4-4 करोड़ रूपये देने की पेशकश कर रहे है। बीजेपी नेताओं ने इस विडिओ ऑफ़ को कांट-छांट कर बना बताया है।

जब पुलिस ने स्थानीय कोर्ट में इनका रिमांड माँगा तो कोर्ट ने यह याचिका यह कह कर ख़ारिज करदी कि पुलिस ने ऐसे कोई पुख्ता प्रारंभिक प्रमाण पेश नहीं किये जिसके आधार पर उनको रिमांड पर भेजा जाये। बाद में उच्च न्यायलय ने प्रथम दृष्टि से पुलिस के केस को  सही पाया तथा तीनों को 14 दिन  के जुडिशियल रिमांड पर भेज दिया। 

राजनीतिक हलकों में इस मामले को चुनाव जीतने का स्टंट मात्र समझा गया। राज्य की 119 सदस्यों वाली विधान सभा में  भारत राष्ट्र समिति के सदस्यों का संख्या 100 से ऊपर है। बीजेपी के केवल 4 ही सदस्य है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि वे सत्तारूढ़ दल के केवल चार विधायको को खरीद कर क्या करेंगे क्योंकि इससे न तो भारत राष्ट्र समिति की सरकार गिरेगी और और न ही बीजेपी की सरकार बन सकेगी। सरकार का पतन तभी संभव है जब इसके कम से कम 50 विधायक पार्टी छोड़ अन्य दल में शामिल हो जाये, जो संभव होता नहीं लगता। इसमें कोई संदेह नहीं कि बीजेपी इस राज्य में अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों में पूरी ताकत झोंक कर भारत राष्ट्र समिति को कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रही है। कुछ समय पूर्व हैदराबाद नगर निगम के चुनावों में बीजेपी इस सत्तारूढ़ दल को कड़ी टक्कर दी थी तथा इसकी सीटें 4 से बढ़कर 40 से अधिक हो गयी थी। तभी से बीजेपी अगला विधान सभा चुनाव पूरी ताकत से लड़ने के तैयारी में लगी है। 

वास्तव में मुनुगौडे विधान सभा उपचुनाव शुरू से ही विवाद में आ गया था। यहाँ भारत राष्ट्र समिति और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला था। समिति हर हाल में  चुनाव जीतना चाहती थी। समिति चाहती थी कि किसी अन्य उम्मीदवार को कोई ऐसा चुनाव चिन्ह नहीं दिया जाये  जो उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह   कार से मिलता जुलता हो। इस चुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार को बुलडोज़र चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया था। पार्टी ने  यह गुहार लगाई कि बुलडोज़र चुनाव चिन्ह मतदाताओं को उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह कार से भ्रमित कर सकता है इसलिए इस उम्मीदवार को और कोई चुनाव चिन्ह आवंटित किया जाये, नियमों और प्रावधानों के अनुसार किन्हीं कारणों से किसी उम्मीवार का चुनाव चिन्ह बदलने का अधिकार केवल केंद्रीय चुनाव के ही पास है। 

पता नहीं किन परिस्थितयों के चलते राज्य निर्वाचन अधिकारी ने उक्त उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह बदल दिया। जब  यह बात चुनाव आयोग की नज़र में लाई गई  तो आयोग ने तुरंत प्रभाव से राज्य चुनाव अधिकारी को बर्खास्त कर दिया। राज्य चुनाव अधिकारी होता तो राज्य केडर का ईएएस अधिकारी होता है लेकिन  उनकी जवाबदेही आयोग के प्रति ही होती है। ऐसा माना जाता है कि उक्त अधिकारी ने राज्य के सत्तारूढ़ दल के दवाब में आकर चुनाव चिन्ह बदला था।  उधर समिति के नेताओं का कहना है कि अधिकारी का निर्णय सही था तथा ने आयोग उसे बीजेपी के दवाब में आकर ही बर्खास्त किया है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)