ईद-उल-फितर के मायने

लेखक : सद्दीक अहमद 

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ईद दुनिया में मनाया जाने वाले सबसे और महत्वपूर्ण त्योहारों में शुमार है। दुनिया भर में मुस्लिम कैलेंडर में बारह महीनों में से एक महीने का नाम रमजान है। माहे रमजान का नाम ज़ेहन आते ही हर मुस्लिम ख़ुश हो जाता है। माहे रमजान का महीना बड़े ही पाकीज़गी से मनाया जाता है। मज़हब-ए-इस्लाम में मुक़द्दस माहे रमजान के पूरे महीने रोजे अर्थात् उपवास रखने के बाद नया चांद देखने के अवसर पर ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार माहे रमजान के आखिरी रोजे के अगले दिन चाँद दिखने पर मनाया जाता है।

दुनिया में सभी लोग अमीर नहीं हैं और सभी ग़रीब नहीं है। शायद दुनिया बनाने वाले ने ये सब देखते हुए साल में एक बार ईद का त्यौहार बनाया है। ईद के मायने ख़ुशी से होते हैं यानि ईद मनाने से पहले पूरे साल का हिसाब लगाकर मुस्लिम धर्मावलंबी अपने माल ओ दौलत की ज़कात देते हैं। ज़कात माल ओ दौलत के हिसाब से अदा कर उसकी रकम या कपड़े उन लोगों में तकसीम किये जाते हैं जो लोग इसके मुस्तहिक़ होते हैं ताकि ईद की ख़ुशी में वे भी लोग ख़ुशी ख़ुशी शरीक हो सके जिनके पास कुछ ना हो। वे लोग भी उसी मस्जिद उसी सफ में खड़े होकर नमाज़ अदा करते हैं जहाँ अमीर गरीब का भेद नहीं होता। किसी शायर ने ईद के ऊपर एक शेर कहा  "एक ही सफ में खड़े हो गए महमूदो अयाज़, न कोई बंदा रहा न कोई बंदा नवाज़"। यानि सभी नए कपड़ों में एक से नमाजी नज़र आते हैं! ईदुल फितर की नमाज़ से पहले परिवार के हर इंसान (चाहे नमाज के पहले कोई बच्चा भी पैदा हुआ हो) का फितरा अदा करना होता है। जिसके लिए अनाज, गेहूं, जौ या उसके एवज में पैसा भी दिया जा सकता है। जैसा कि इस साल हर एक इंसान पर 50 रूपये फितरा अदा करने का हिसाब बनता है। जिसे ईद की नमाज के पहले अदा किया जाता है।  

ईद की सामूहिक नमाज़ से पहले सुबह ग़ुस्ल कर नए कपडे पहनना, खुशबू लगाना और घर से नमाज के लिए निकलने से पहले कुछ मीठा खा कर निकलना। जिसके लिए पुराने लोग गुड़िया शक्कर और छुआरे खाकर जाते थे। आज भी नमाज पर जाने से पहले खजूर, छुहारे या सिवई खाई जाती है। बाद नमाज ईद एक त्यौहार की शक्ल ले लेता है और लोग आपस में गले मिलकर एक दूसरे को मुबारक कहते हैं। इस अवसर पर अपने पारिवारिक रिश्तेदारों, दोस्त या साथी कर्मचारियों को भी मुबारकबाद देते है और घर पर दावतों का सिलसिला जारी हो जाता है। जिसमें आसपास एवं सभी जाति, धर्म के लोग शामिल होकर एक दूसरे के साथ ख़ुशी का इज़हार करते हैं। पारिवारिक दावतों के साथ बच्चों के लिए या छोटों के लिए ईदी का चलन भी इस त्यौहार की एक विशेषता है, जिसे पाने वाला भी खुश नज़र आता है और देने वाले भी खुश होते है। 

इस अवसर पर सभी अपने-अपने अंदाज़ में घरों में स्पेशियल खाने बनाते हैं, ताकि आने वाले मेहमानों के लिए यह दावत यादगार बन सके। इबादत के साथ भोजन और मेल-मिलाप भी इस त्योहार की प्रमुख विशेषता है। जिसका उदाहरण इस अवसर पर लगने वाले मेले जहाँ सभी एक दूसरे के साथ आनन्दित होकर ईद का उत्सव ख़ुशी ख़ुशी मनाते है। ईद हमें मिल-जुलकर रहना सिखाती है और ईद यह शिक्षा देती है कि हम जीवन में सभी के साथ मिलजुल कर आनन्दमय जीवन व्यतीत करते रहें। (लेखक का अपना सामान्य विचार है, जिसे किसी मज़हब से जोड़कर ना देखा जाए)