सच्चा सिपाही : फादर्स डे


सीमा पर हर पल चौकन्ने रहने वाले सैनिक भी एक पिता की भांति राष्ट्र सुरक्षा को मुस्तैद रहते हैं : सांकेतिक फोटो 


पितृ-दिवस (फादर्स डे) पर एक पूजनीय पिता को समर्पित


86 वर्ष के हो चुके हैं बाबा। भारत-चीन सीमा पर तनाव के समाचार रोज समाचार पत्र और टी.वी. चैनलों से सुनते हैं, और याद करते हैं वो दिन जब 1962 के भारत-चीन युद्ध में वे सीमा पर थे। चंडीगढ़ से हवाई जहाज द्वारा उन्हें सीधे लद्दाख में उतारा गया था। भाषा-अनुवादक के रूप में वे लद्दाख के स्थानीय लोगों से बात करके वहाँ के हालात का जायजा लेकर अपने साथी सिपाहियों को जानकारी देते। युद्ध के पूरे समय और युद्ध खत्म होने के बाद भी वे “चूसल” सीमा पर थे।


1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में वे लाहौर में तैनात थे जहाँ उन्होंने उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी आदि भाषाओं के लिए साथी सैनिकों को प्रशिक्षित किया। बाबा को सेना की सेवा छोड़े 50 वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। लेकिन जीवन के युद्ध में वो आज भी एक सिपाही की तरह डट कर खड़े हुए हैं।



सैनिक भी एक पिता की भांति राष्ट्र सुरक्षा को मुस्तैद रहते हैं : सांकेतिक फोटो


बाबा ने 5 वर्ष की छोटी सी उम्र में अपने पिता को खो दिया था। उनकी माँ ने जीवन के अकेलेपन, भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द और कठिन आर्थिक परिस्थितियों में उन्हें पाला-पोसा। बाबा ने जीवन के अनेक वर्ष आर्थिक और भावनात्मक संघर्ष के साथ बीताये। कई बार मौत के मुंह से वापस आये।


वृद्धावस्था निकट थी, श्रवण-कुमार सा बेटा बड़ा हो गया था। अब जीवन आराम से बीतनेवाला था। किन्तु, एक हादसे में बेटा चल बसा। अन्दर से टूट गए बाबा, बहुत से सपने देखे थे, बेटे के साथ उन्होंने। लेकिन, उन्होंने हिम्मत बटोरी और सिपाही थे तो उसी जज्बे के साथ उठ खड़े हुए।


आध्यात्मिकता की राह पकड़ ली और अपनी पत्नी के साथ ध्यान केंद्र के पास ही घर बनवा कर शान्ति से जीवन व्यतीत करने लगे। बेटियां अक्सर मिलने आ जाती थीं। कुछ वर्ष गुजरे और पत्नी का गंभीर बीमारी से देहांत हो गया। बाबा फिर टूटे, लेकिन इस सिपाही ने फिर साहस बटोरा।


बेटियों के लिए तो अब यही पिता हैं और यही माँ भी। अभी साल भर ही हुआ था, पत्नी का साथ छूटे। सबसे छोटी बेटी का विवाह नहीं हो पाया, पर बाबा ने उसे खूब पढ़ाया लिखाया और 5 वर्षों तक उसने भी सेना में अधिकारी पद पर कार्य किया, वह बाबा के पास आकर रहने लगी। 2-3 महीने बीते कि पता चला बेटी को कैंसर हो गया। इस बार बाबा के टूटने की आवाज तक सुनाई नहीं दी। अपनी एक करीबी रिश्तेदार की मदद से बेटी का इलाज करा उसे वापस घर ले लाये।


आज बाबा अपनी बेटियों के साथ भारत-चीन युद्ध के अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। बेटियां गौरव के साथ उनकी ओर देखती हैं और खुद पर भी गर्व करती हैं कि वे एक सच्चे सिपाही की बेटियाँ हैं। (लेखक के अपने विचार हैं)


लेखिका : डॉ. सरिता अग्रवाल 


जयपुर