क्या मुल्तानी मिट्टी कोरोना से सुरक्षा दे सकती है ?


डॉ. पी.डी. गुप्ता
पूर्व निदेशक ग्रेड साइंटिस्ट, सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, हैदराबाद
ई-मेल: pdg2000@hotmail.com मोबाइल : 080728 91356


आज के इस कोरोना महामारी के समय में मुल्तानी मिट्टी के उपयोग ने पूरी दुनिया को अपने जड़ों में झांकने पर मजबूर किया है। यदि पृथ्वी पर प्राणियों के विकास पर ध्यान दें तो पता चलता है कि निश्चित रूप से वायरस मनुष्य की तुलना में पहले विकसित हुए हैं। वैसे देखा जाए तो मनुष्य और वायरस के बीच  का सम्बन्ध काफी पुराना है।


यह बहुत ही दिलचस्प बात है कि साबुन युग के आरम्भ से पहले मनुष्य अपने त्वचा से जुड़े रोगाणुओं (जैसे- वायरस, बैक्टीरिया अन्य रोगाणु) से कैसे छुटकारा पाया करते थे ? ऐसा माना जाता है कि लोग ज्यादातर सादे पानी से ही खुद को धोया करते थे, लेकिन जब लोगों को लगा कि सादे पानी से त्वचा से सब कुछ साफ नहीं होता है, तो बाद में भूमध्य सागरीय लोग अपनी त्वचा पर तेल मला करते थे ताकि मैल इकट्ठा किया जा सके और बाद में उसे साफ किया करते थे।



सापिंडस, जिसका मतलब है सोप (साबुन) और इंडस (भारत) यानि भारत से प्राप्त साबुन। जिन्हें सापिंडस (हिंदी/संस्कृत में रीठा के नाम से जाना जाता है) को प्राचीन भारत में उपयोग में लाया जाता था। रीठा के अलावा प्राचीन भारत में मुल्तानी मिट्टी का प्रयोग इंसान अपनी त्वचा और बालों को धोने के लिए किया करते थे। इस विशेष प्रकार की मिट्टी को "मुल्तानी मिट्टी" के नाम से जाना जाता है।


मुल्तानी मिट्टी (MM) ज्वालामुखी की विघटित राख़ होती है जो की 'मुल्तान' की जगह जो की भारत में पाई जाती है। 'फुल्लर्स अर्थ'  इसका अंग्रेजी नाम है यह आरम्भिक अंग्रेजों के द्वारा ऊन उद्योग में काम में लाई जाती थी। इसे फुल्लर प्रांत के लोग ऊन के वस्त्रों को साफ़ करने तथा तेल के दाग हटाने के लिए काम में लेते थे, क्योंकि इस मिट्टी में तेल को अवशोषित करने की क्षमता होती है। खनिज पदार्थों से युक्त फुल्लर मिट्टी में हाइड्रो सेल्युमिनियम सिलिकेट्स या मिट्टी के खनिजों की अलग-अलग संयोजन होती है। मुल्तानी मिट्टी के सामान्य संयोजन मोंटमोरोलो नाईट (अल्युमिनियम से भरपूर मिट्टी), काओलाईनेट (सफ़ेद या भूरे रंग की मिट्टी) सम्मिलित होती है।



फुल्लर मिट्टी में अन्य खनिजों की छोटी मात्रा (जैसे केल्साइट, डोलोमाइट और कार्टज) शामिल रहते हैं। मुल्तानी मिट्टी के विश्लेषण से पता चला है कि इसमें As, Br, Cd, Hg तथा Sb नामक तत्व होते हैं और इनकी मात्राएँ मानव शरीर में नुकसान नहीं पहुँचाती है, लेकिन शीशे (Pb) की मात्रा कुछ अधिक होने के कारण इसका उपयोग सिमित मात्रा में ही करना चाहिए। मुलतानी मिट्टी खनिजों से भरपूर होती है और इसमें अतिरिक्त रूप से एंटीसेप्टिक, जीवाणुरोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुण भी पाए जाते हैं। मुल्तानी मिट्टी के साथ टमाटर तथा नींबू का रस, दूध, शहद एवं गुलाब जल और साधारण जल में लेप बनाकर उपयोग करने से अधिक असरदार बन जाता है।


वैसे अभी शोध नहीं हुआ है, लेकिन इससे वायरस हमले को रोकने का त्वचा सम्बन्धी लेप भी बनाने की काफी अधिक सम्भावना है। आयुर्वेदिक साहित्य में इस बात के सबूत उपलब्ध हैं कि कुछ इनआर्गनिक (अकार्बनिक) पदार्थों जैसे कि ज्वालामुखी राख़, में औषधीय तत्व होते हैं। अत: ज्वालामुखी की राख में त्वचा साफ करने वाले उत्कृष्ट तत्व पाए जाते हैं। इतना ही नहीं, मुल्तानी मिट्टी अपने सूजन विरोधी (इंफ्लामेशन) तत्व के लिए प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध है - जो त्वचीय एक्जिमा (खुजली) तथा सोरायसिस में सूजन वाली त्वचा को लाभ पहुँचाती है।



ज्वालामुखी की राख़ ऐसी मिट्टी की तरह काम करता है, जो सीबम  (sebum) को सोखने के लिए, विशेष रूप से तैलिये चेहरे से, मुँहासे वगैरा मिटाने में विशेष मददगार होता है। ज्वालामुखी की राख़, अनेक खनिजों और एंटीसेप्टिक तथा बैक्टीरियल तत्वों से भरपूर होने के कारण त्वचा पर सूजन, खुजली ठीक करने में काफी गुणकारी होती है। मूलरूप से त्वचा किसी भी कारण से प्रदूषित होती हो, तो ज्वालामुखी राख़ - मुल्तानी मिट्टी उसे ठीक करने का अच्छा साधन है।


जैसाकि ऊपर कहा गया है कि मुल्तानी मिट्टी में सीबम जो चेहरे को प्रभावित करती है - को साफ करने की विशेष क्षमता निहित है। यह इस बात को जोर देकर कहने पर मजबूर करता है कि मुल्तानी मिट्टी त्वचा पर बैठने वाले सूक्ष्म जीव, जैसेकि बैक्टीरिया और वायरस को त्वचा के संक्रमण से बचाने में सहायक हो सकती है। इसके अंतर्गत त्वचा से जुड़ने वाले कोरोना वायरस को भी लिया जा सकता है। हालांकि अभी इस बात के निर्धारण के लिए वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध नहीं है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं विचार है)


(साभार : अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद हैदराबाद के चंद्रशेखर द्वारा किया गया)