प्रदूषण से मुक्ति मिले तब बचे जिंदगी : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।

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प्रदूषण के मामले में हमारा देश कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। वह बात दीगर है कि प्रदूषण के चलते लोग जानलेवा बीमारियों के चंगुल में आकर अनचाहे मौत के मुंह में जा रहे हैं और उनकी तादाद दिनोंदिन तेजी से बढ़ती जा रही हो, लेकिन हालात इसके जीते जागते सबूत हैं कि सरकार के लाख दावों के बावजूद प्रदूषण पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है। आई क्यू एयर की हालिया रिपोर्ट इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि हमारा देश दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शुमार है और वह दुनिया में तीसरे पायदान पर हैं। और तो और देश की राजधानी दिल्ली दुनिया में सबसे प्रदूषित राजधानियों ढाका, उवागाडोगू, दुशानवे और बगदाद में शीर्ष पर है। जबकि पडो़सी देश बांग्लादेश पहले और पाकिस्तान दूसरे पायदान पर है। 

भारत के बाद ताजकिस्तान और बुर्किनोफासो का नम्बर है। दरअसल बढ़ता प्रदूषण जहां पर्यावरणीय चुनौतियों को और भयावह बना रहा है, वहीं आबादी के लिए स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढा़ने में अहम भूमिका निबाह रहा है जिससे अनचाहे होने वाली मौतों में बेतहाशा बढो़तरी दर्ज हो रही है। इसके पीछे पी एम 2.5 कणों की महत्वपूर्ण भूमिका है जिसका आकार 2.5 माइक्रोन के करीब होता है। इसके बढ़ने से धुंध छाने, साफ न दिखाई देने, सांस के रोगों, गले में खराश होने, जलन और फेफडो़ं की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है जो जानलेवा साबित होती हैं। असलियत में हवा में पी एम 2.5 की मात्रा 60 और पी एम 10 की मात्रा 100 होने पर ही हवा को सांस लेने के लिए सुरक्षित माना जाता है। होता यह है कि गैसोलीन, तेल, डीजल ईंधन, वाहनों का धुआं, कोयला, कचरा, पराली और लकडी़ के जलाने से हुए धुंए से पी एम 2.5 का उत्पादन अधिकाधिक मात्रा में होता है। 

अपने छोटे आकार के कारण पार्टीकुलेट मैटर फेफडो़ं में आसानी से गहराई तक पहुंच जाते हैं। यह पी एम10 से भी ज्यादा नुकसानदेह होता है।दरअसल आई क्यू एयर की हालिया रिपोर्ट दक्षिण एशियाई देश भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए एक गंभीर चेतावनी है जिनकी जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा पर निर्भरता अधिक है। वह बात दीगर है कि हमारे देश में सौर ऊर्जा के उपयोग पर सरकार न केवल बढा़वा दे रही है बल्कि उस पर राहत देकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रही है। सरकार  2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा से 5 लाख मेगावाट विद्युत उत्पादन के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है।सरकार का यह प्रयास पर्यावरण के साथ साथ ऊर्जा क्षमता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। 

क्योंकि ऊर्जा के परंपरागत स्रोत पर्यावरण में प्रदूषण का जहर तो घोल ही रहे हैं, वे मानव स्वास्थ्य के भी दुश्मन साबित हो रहे हैं।ऐसी स्थिति में स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि का सरकार का प्रयास प्रशंसनीय है, सराहनीय भी है। क्योंकि यदि भारत इस दिशा में आने वाले 10 सालों में अपने हरित ऊर्जा के लक्ष्यों को हासिल कर लेता है तो भारत में कुल ऊर्जा बढो़तरी में सौर एवं पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी दो तिहाई तक पहुंच जायेगी और हम परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर होंगे। लेकिन फिलहाल हकीकत यह है कि भारत लगातार वायु गुणवत्ता की खराब होती समस्या से जूझ रहा है जिसमें पी एम 2.5 की सांद्रता विश्व स्वास्थ्य संगठन के सालाना स्तर से भी 10 गुणा ज्यादा है। इसका दुष्परिणाम यह है कि हमारे देश के तकरीब 1.36 अरब लोग पी एम 2.5 की उच्च सांद्रता की चपेट में हैं। यह डब्ल्यू एच ओ द्वारा अनुशंसित सालाना स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक है।

यहां सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि मानव जीवन तो प्रदूषण की मार से बेहाल है ही, पेड़-पौधे भी तापमान वृद्धि के चलते सांस नहीं ले पा रहे हैं।  जो पेड़ वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने में मदद कर रहे थे, वे अब उसमें खुद को असमर्थ पा रहे हैं। हालिया शोध इसके प्रमाण हैं कि अब पेडो़ं में सांस लेने और जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने की क्षमता कम हो गयी है।अब यदि वायु प्रदूषण से मानवीय स्वास्थ्य को होने वाले दुष्प्रभावों पर सिलसिलेवार गौर करें तो पाते हैं कि दावे कुछ भी किए जायें, हकीकत में वायु प्रदूषण अब नासूर बन गया है। यह अब किसी खास मौसम की नहीं, बल्कि सालभर रहने वाली स्थायी समस्या बन चुकी है। 

यह तो अब लोगों की उम्र पर भी बुरा असर डाल रहा है। इससे जहां देशभर में रहने वाले लोगों की उम्र में 5.3 वर्ष की कमी आई है, वहीं राजधानी दिल्ली के लोगों की उम्र में 11.9 वर्ष की औसतन कमी आई है। शिकागो यूनीवर्सिटी का अध्ययन इसका प्रमाण है। उसके अनुसार पूरे भारत में एक भी जगह ऐसी नहीं है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों पर खरी उतरती हो। यह भी कि हृदय संबंधी बीमारियों से औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 4.०5 वर्ष कम हो जाती है। जबकि बाल और मातृ कुपोषण से जीवन प्रत्याशा 1.8 वर्ष कम हो जाती है। देश के सबसे प्रदूषित उत्तरी क्षेत्र में 52.2 करोड़ यानी 38.9 फीसदी आबादी वास करती है। यदि प्रदूषण का वर्तमान स्तर बरकरार रहता है तो इस आबादी की जीवन प्रत्याशा में ड्ब्ल्यू एच ओ के दिशा निर्देश के सापेक्ष औसतन आठ वर्ष व राष्ट्रीय मानक के सापेक्ष 4.5 वर्ष की कमी का खतरा है। 

भारत में 67.4 फीसदी आबादी ऐसी जगहों पर रहती है जो भारत के खुद के बनाये मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से भी ज्यादा प्रदूषण को झेल रही है।  कैलीफोर्निया यूनीवर्सिटी के शोध- अध्ययन से इसका खुलासा हुआ है कि बेहतर वायु गुणवत्ता से आत्महत्या की दर में कमी आ सकती है। शोध का निष्कर्ष जो नेचर सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित हुआ है, के अनुसार चीन में पिछले पांच सालों में वायु प्रदूषण घटने से वहां आत्महत्या के चलते मौत के मामलों में तेजी से कमी दर्ज की गयी है। 

यही नहीं  यदि आप वायु प्रदूषण के बीच दो घंटे भी रह लेते हैं तो आपके मस्तिष्क के कामकाज में बिगाड़ पैदा हो सकता है। क्योंकि इससे मस्तिष्क की फंक्शनल कनेक्टिविटी कम हो जाती है। एन्वायरमेंटल हेल्थ जर्नल में प्रकाशित यूनीवर्सिटी आफ ब्रिटिश कोलंबिया के अध्ययन में वायु प्रदूषण तथा मस्तिष्क के संज्ञानात्मक कार्यों के बीच संबंधों के मिले नये प्रमाणों से यह खुलासा हुआ है। अब तो यह साफ हो गया है कि जिस तरह से वायु प्रदूषण का मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है, उसी तरह जंगल की आग से निकलने वाले धुंए का भी स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

असलियत यह है कि खुले में हो रहे निर्माण से उड़ने वाली और सड़कों की धूल से सांसों पर सबसे ज्यादा संकट  है। एक तरह से यह वायु प्रदूषण की सबसे बडी़ वजह है जिसके चलते लोगों की जिंदगी धुंधली हो रही है। धूल की वजह से लोग खांसी और सांस की तकलीफ से जूझने को विवश हैं। एम्स के श्वांस रोग विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डाक्टर करण मदान का कहना है कि धूल में छोटे और बडे़ दोनों तरह के प्रदूषक मौजूद होते हैं। बडे़ आकार के प्रदूषक जैसे पी एम 10 और छोटे आकार के पी एम 2.5 होते हैं। पी एम 10 की वजह से ऊपरी श्वसन तंत्र, आंख और नाक में जलन और छोटे आकार के पी एम 2.5 के कण सांस के जरिये अस्थमा, गले का संक्रमण, सांस लेने में सी टी की आवाज आना, खांसी, त्वचा सम्बंधी बीमारी और ब्रोंकाइटिस के कारण होते हैं। ये इतने छोटे आकार के होते हैं कि खून के रास्ते शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच जाते हैं। 

इससे दिल की बीमारी का भी खतरा बढ़ जाता है। श्वसन तंत्र में अवरोध भी अचानक होने वाली मौतों का एक अहम कारण है। एम्स के फारेंसिक विभाग के अध्यक्ष डा० सुधीर गुप्ता के मुताबिक 22 फीसदी मौतों की मुख्य वजह श्वसन तंत्र में अवरोध है। एक आकलन के तहत सुबह जब घर या फ्लैट की सफाई होती है तो उससे तकरीब 200 ग्राम तक धूल निकलती है। इस बाबत एनजीटी ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात समेत कई राज्यों को धूल कम करने के आदेश दिये हैं। यहां इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत यदि डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश के अनुरूप पार्टिकुलेट प्रदूषण कम कर लेता है तो देश की राजधानी दिल्ली के निवासियों की जीवन प्रत्याशा 11.9 वर्ष बढ़ जायेगी। 

वह बात दीगर है कि दिल्ली में प्रदूषण मुक्ति की दिशा में वायु गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु 2025 तक दिल्ली सरकार की 4 हजार ई बसे लाने और ई मोबिलिटी बढा़ने के लिए 2,62,066 चार्जिंग स्टेशन के अलावा और लगाने की योजना है लेकिन यह काफी नहीं है। लोगों को भी इस बात को लेकर सचेत रहना चाहिए कि वह किस तरह की हवा में सांस ले रहे हैं और वाहनों के धुंए जैसे नुकसानदायक वायु प्रदूषकों को कम करने के क्या उपाय किये जा रहे हैं या नहीं और यदि वे प्रयास किये भी गये हैं तो किस सीमा तक प्रभावी हैं या नहीं। इस बाबत जागरूकता जरूरी है। इसके साथ इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि सड़क पर जाम में फंसने पर गाडी़ का कांच नीचे करने से पहले भलीभांति सोच विचार कर लें। यह भी कि आपकी कार का एयर फिल्टर ठीक से काम कर रहा है या नहीं। और मोटर साईकिल से या पैदल जाते समय कम व्यस्त सड़क पर ही चलें। यह थोडी़ सी सावधानी हमें काफी हदतक राहत दिलाने में मददगार हो सकती हैं। 

निष्कर्ष यह कि इसमें अब दो राय नहीं है कि वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बडा़ पर्यावरणीय खतरा बन चुका है। यही नहीं दिनोंदिन न्यूरोकाग्निटिव विकृतियां बढ़ने की घटनाएं सामने आ रही हैं। इसको देखते हुए नीति निर्माताओं द्वारा इस मामले पर व्यापक स्तर पर विचार करना बेहद जरूरी है तभी कुछ बदलाव की उम्मीद संभव है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)