लेखक : डॉ. सत्यनारायण सिंह
लेखक रिटायर्ड आई.ए.एस. अधिकारी है
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देश की सबसे बड़ी पुरानी राजनैतिक पार्टी राष्ट्रीय कांग्रेस ने निसंदेह महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद जैसे राष्ट्रीय नेताओं के नेतृत्व में विदेशी दासता के विरूद्ध संघर्ष किया। राष्ट्रवादी चिंतन एवं विचारधारा, हर कीमत पर कायम रखकर कांग्रेसी नेताओं ने गरीब, शोषित, पिछड़े व असहाय लोगों का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस सरकारों ने देश का सर्वांगीण विकास करने में कोई कमी नहीं रखी और आज हमारा देश विश्व के प्रमुख देशों में गिना जाता है।
लगभग 130 साल पुरानी इस राष्ट्रीय पार्टी का अब यह दुर्भाग्य है कि कांग्रेसी नेताओं में गत वर्षाे में राष्ट्रीय हित में चिंतन, वैचारिक सोच एवं आदर्शो में कमी आई और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त होने से संगठन कमजोर हो गया। इस राष्ट्रीय पार्टी का यह भी दुर्भाग्य है कि आज श्रीमती सोनिया गांधी व राहुल गांधी के अलावा अन्य कोई सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता नहीं है, जो नैतिकता, आदर्शो व मूल्यों में विश्वास रखकर पार्टी के जनाधार को सिकुड़ने से रोक सके एवं सांप्रदायिक, जातिगत संकुचित विचारधारा वाली अन्य पार्टियों से सीधा मुकाबला कर सके।
श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी ने कमान संभाली तब 1985 में ही कांग्रेस के मुम्बई अधिवेशन में संगठन की कमजोरियों पर चर्चा करते हुए उन्होने कहा था कि ‘‘देशभर के छोटे कांग्रेस कार्यकर्ताओं, में पार्टी के बड़े नेताओं व कार्यक्रमों के प्रति उत्साह है, परन्तु सत्ता में दलालों के कारण वे असमर्थ है। राजनैतिक सेवा और कल्याण की भावना नहीं रही। सत्ताभिलाषी बन रहे हैं। ऐसे लोग जनता के बीच कार्य करने के काबिल नहीं रहे और कांग्रेस को एक ऐसे खोल में तब्दील कर रहे है जो सेवा और त्याग से रिक्त है।‘‘
श्रीमती सोनिया गांधी ने वरिष्ठ कांग्रेसजनों के लिए अनेक निर्देश जारी किये और कहा है कि ‘‘उनको सादगी का जीवन व्यतीत करना चाहिए, वैभव प्रदर्शन से बचना चाहिए, अपनी संपत्तियों का पूरा ब्यौरा देना चाहिए और जनता में अपनी छबी को बेहतर बनाना चाहिए।‘‘ उन्होंने यह भी कहा था‘‘ कि कांग्रेस में जान फूंकना ऐतिहासिक आवश्यकता है। कांग्रेसजनों को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए जनान्दोलनों में भाग लेना चाहिए।‘‘
कुछ अर्से पूर्व राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा था ‘‘आज राजनीति में आने के चार रास्ते हैं। पहला प्रभाव या पैसा, दूसरा राजनेताओं से रिश्तेदारी, तीसरा राजनीति में दोस्ती या जान-पहिचान और चौथा आम आदमी की आवाज बनकर राजनीति में आये, परन्तुु आज चौथा रास्ता नही पकडा जा रहा है। आज के नेताओं का कांग्रेस के सिद्धान्तों के प्रति कोई कमीटमेंट नहीं है। आम जनता के दुःख दर्द में सम्मिलित नहीं होते, जन समस्याओं के हल के प्रति उदासीन हो गये हैं। येन-केन प्रकारेण बड़े नेताओं के नजदीक आने को प्रयासरत रहते है।"
कांग्रेस भारत की सबसे बड़ी पार्टी है। उसका अपना इतिहास है। उसके नेतृत्व के नीचे देश ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है परन्तु कांग्रेस कर्मी अपनी पार्टी नीति कार्यक्रमों व देन को आम जनता तक पहुंचाने में असफल रहा है। कांग्रेस कर्मी पार्टी द्वारा प्रारम्भ किये कार्यक्रमों से नहीं जुड़ते, निष्क्रिय व अनकन्सर्न्ड, रहते है। शीर्ष नेतृत्व चाहे कितना ही साफ सुथरा, निष्पक्ष व प्रभावी क्यों नहीं हो, संगठन की कमजोरी के कारण अपने व्यक्तित्व व चमत्कारिता का लाभ पार्टी को देने में निष्फल रहता है।
राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों को पार्टी से विदा करने की बात कही थी, वह नहीं हो पाई। श्रीमती सोनिया गांधी व राहुल गांधी के निर्देशों की पालना भी नहीं हुई और कांग्रेसकर्मियों की जनता में उज्ज्वल छबि, चरित्रवान व सेवाभावी व्यक्तित्व नहीं बना। मौजूदा दौर में देखे तो कांग्रेस की हार का मुख्य कारण उसके आंतरिक संगठन में ही निहित है। चुनाव जीतने के लिए पार्टी संगठन के एकजुट होने की जो आवश्यकता होती है। उसका परिचय कांग्रेस नहीं दे सकी।
प्रान्तीय दलीय पदाधिकारियों का पार्टी के प्रति अविश्वास और कार्यक्रताओं की अनुशासनहीनता पार्टी के रणनीतिकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय है, वैचारिक स्तर पर आदर्शो व मूल्यों को लेकर कहीं खुली बहस नहीं हो रही है। जिस कांग्रेस ने कभी वर्ण व्यवस्था का घौर विरोध किया था और अनपढ़ समाज को लोकतंत्र की वर्णमाला की बारहखड़ी सिखाई थी, उसके वरिष्ठ नेता, पार्टी को नेतृत्व देने के लिए आगे आने का साहस नहीं कर पा रहे है। यह स्थिति पार्टी के लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षय की दयनीय स्थिति का चित्रण प्रदर्शित करती है।
जिस ग्रामोन्नमुखी कांग्रेस की इंदिरा गांधी ने गरीब, असहाय तबके की मदद के लिए परिकल्पना की थी वह कांग्रेस आज सत्ताभिलाषी राजनेताओं के ड्राईंग रूमों में सिमट कर रह गई है। अब राजनैतिक चिंतन, विचारधारा और आदर्शो के आधार पर काम करने वाले आगे नहीं बढ़ रहे। संदिग्ध चरित्र व गलत चाल चलन वाले लोगों को पार्टी से विदा करना आवश्यक है जिनको कभी राजीव गांधी ने सत्ता के दलाल की संज्ञा दी थी।
नयी सदस्यता ग्रहण कर राजनीति की शुरूआत करने वाली युवा लॉबी में कार्यकुशलता का माद्दा ही नहीं है। नैतिकता के स्तर में गिरावट दिन-ब-दिन आती जा रही है, पद लालूपता बढ़ती है, संगठनात्मक चुनाव को आवश्यक नहीं मानते, गुटबाजी कर अपना कार्य निकालना ही साधन बना लिया है। स्थिति यह है कि सत्ता से बाहर होने व झटके खाने के बावजूद कांग्रेसकर्मी नहीं बदल रहे हैं। कांग्रेस में घुमा फिराकर छोटे-मोटे फेरबदल के साथ वर्षो से वही पदाधिकारी, महासचिव, सचिव, प्रकोष्ठों के विभागाध्यक्ष, संयोजक, व कार्य समिति सदस्य बने हुये हैं। पार्टी की रीति-नीति और आदर्शो को अपनाने के बजाय स्वयं वंशवाद का दामन थाम कर आगे बढ़ते रहना चाहते है। मैं नही तो मेरा बेटा, मेरा भाई, मेरी पत्नी, मेरी बहन यही कोशिश चलती रहती है।
आज कांग्रेस विकास के मुद्दे छोड़ भाजपा विरोध के सहारे बढ़ने का प्रयास कर रही है। दिल्ली चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिलीं, वोट प्रतिषत भी 5 फिसदी से नीचे चला गया। अभी उत्तर प्रदेष में स्वायत्तषासी संस्थाओं में स्थिति बदहाल हो गई, पंजाब मं उप उप चुनाव हार गई, पार्टी गुट बाजी और अन्दरूनी झगड़ों से झुजती रहीं। निराशा और हताशा में चुनाव लड़ा, पार्टी नेतृत्व असमंजस में रहा। कांग्रेस ने लगातार 15 साल दिल्ली में सत्ता संभाली और लगातार दो चुनाव में उसका खाता नहीं खुल सका।
देश के बंटवारे का आरोप व जिम्मेदारी कांग्रेस पर खुले आम डाली जा रहा है। जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कांग्रेस कर्मीयों ने स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास नहीं पढ़ा इसलिए जवाब नहीं दे पा रहे। देश का बटवारा साम्प्रदायिक पार्टीयों व ब्रिटिश सरकार के सत्त प्रयास के कारण आवश्यक हो गया था। यदि कांग्रेस इसे स्वीकार नहीं करती तो भारत के दो नहीं अनेक टुकड़े हो जाते देश बन जाते, अंग्रेज एवं साम्प्रदायिक ताकतें देश में अनेक स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे।
संगठन के पदाधिकारी ऐसे लोगों को बना रहे है, जिन पर सत्ता के दुरूपयोग तथा कानून तोड़ने के आरोप है तथा जिनका चेहरा लोगों को अब पसंद नहीं आता (जिनका अपने क्षेत्र में जनाधार नहीं है।) जिला समितियों, ब्लाक व प्रकोष्ठों के दफ्तरों पर ताले लगे है। युवक कांग्रेस व एनएसयूआई से लोग मात्र टिकट की आशा से जुड़े है। आज वरिष्ठ नेताओं के पुत्र ही इन संगठनों के पदाधिकारी बनने के अधिकारी रह गये है।
अब कांग्रेस नेतृत्व को अपने संगठन की आवश्यक सर्जरी करनी ही होगी। सिद्धांतवादी कमर्ठ व प्रबुद्ध ईमानदार लोगों को जोड़कर अपने पुराने चेहरे को पुर्नस्थापित करना होगा। देश में लोकतंत्र समाजवाद व धर्म निरपेक्षता कायम रखने, जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायवाद को समाप्त करने के लिए जमीन से जुडे सक्रिय कांग्रेसजनों को जोड कर कमर्ठ सहचारी क्षेत्रीय सदस्यों को जोडकर जनता से सीधे जुड़कर जन समस्याओं केा निराकरण करने वाली जनहितकारी पार्टी की अपनी छबि को उजागर करना होगा। संदिग्ध चरित्र के लोगों व भार बने पदाधिकारियों को विदा करना होगा। जन हितकारी नीतियों की पालना सुनिश्चित करने पर ही पार्टी व देश का कल्याण होगा।
देश की सबसे बड़ी व पुरानी पार्टी कांग्रेस को मिली पराजय के बाद कांग्रेस राज्यों में लगातार कमजोर हुई है। कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए तीन प्रमुख चीजों का ध्यान रखना आवश्यक है। पहला, पार्टी में व्यापक सुधार किया जावे। पार्टी के भीतर पूर्णतया लोकतंत्र लाया जावे। योग्यता की पहचान की व्यवस्था विकसित की जावे। देश के हर कौने में राष्ट्रीय व क्षेत्रीय नेताओं की जिम्मेदारी सुनिश्चित हो। दूसरा, कांग्रेस समावेशी विकास एजेन्डे को हाथ में ले। समाज के सभी वर्गो में सक्रिय हो। आज लोगों में यह भावना है कि विशेष वर्ग को ही विकास का फायदा मिला है। सबको साथ ले जाने वाले विकास की बात बड़ी महत्वपूर्ण व प्रभावी होगी। पार्टी में ईमानदार, अनुभवी व नये चेहरे, नये विचार और नीचे तक जमीनी ऊर्जा लानी होगी जिससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास जागृत हो।
कांग्रेस सदैव हिन्दु-मुस्लिम एकता की अपनी नीति रखती रही है। स्वतंत्रता संग्राम के समय थी, हिन्दु-मुस्लिम के अलावा पिछड़ी जाति के लोग जाति और धर्म से उपर उठकर कांग्रेस में एकजुट हुए थे, कांग्रेस ने सदैव लोगों से धर्म और जाति के पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने का आव्हान किया था। भाजपा-कांग्रेस की लड़ाई केवल सत्ता की लड़ाई नहीं है अपितु एक विचारों की लड़ाई है। जहां कांग्रेस का राष्ट्रवाद, सद्भावना और भाईचारे पर आधारित है वहीं भाजपा का राष्ट्रवाद हिन्दुवाद, वर्ग भेद पर आधारित है। कांग्रेस का इतिहास त्याग, बलिदान, सेवा और ईमानदारी का रहा है जिसे आज के नेताओं ने छोड़ दिया है। अब गांधी टोपी और खादी भी अधिवेशन में ही पहनते है।
कांग्रेस भारत में बहुजनवाद का राजनैतिक रूप है और वह धर्मनिरपेक्षता को कायम रखने की महत्वपूर्ण व प्रतिपादित आवाज रही है। कांग्रेस को इन मूल्यों पर डटे रहना चाहिए। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को चुप्पी छोड़कर अपने-अपने क्षेत्र में सामाजिक मीडिया सहित सभी जगहों पर जनता के बीच जाना चाहिए जिससे उसके मूल्यों, क्रियाकलापों, इरादों में पारदर्शिता व विश्वास कायम हो। लोगों को अपनी सोच में साझा बनाने से उनको अपने पक्ष में लाना आसान होगा। अब तक 21 वीं सदी में मीडिया संचालित राजनीति से कांग्रेस वर्षो से दूर रही है, उसे समझना आवश्यक है। वर्तमान वातावरण से लगता है कि कांग्रेस इस संकट से उभरने में सक्षम नहीं रही।
नेहरू-गांधी परिवार का देश के प्रति उनके लगाव, आजादी व उसके बाद संघर्ष एवं बलिदान, उच्च कोटि का सूझबूझ वाला दमदार नेतृत्व उनका आधार रहा है। कांग्रेस ने दबे कुचले वर्ग के लिए कार्य किया है। विकासशील देशों में पहली बार भोजन, काम, शिक्षा का अधिकार कानून जैसे दूरगामी कदम उठाये है। सूचना का अधिकार लोकतंत्र के प्रति उसके समर्पण का परिणाम है जिसने शासन में अप्रत्याशित पारदर्शिता ला दी है। कांग्रेस के नेतृत्व ने आर्थिक वृद्धि और सामाजिक न्याय दोनों के लिए काम किया है और देश समावेशी तरक्की की ओर बढ़ा है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)