डॉ. भीमराव अंबेडकर को परिनिर्वाण दिवस पर याद करते हुए : वेदव्यास

6 दिसंबर डॉ. भीमराव अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस पर विशेष

लेखक : वेदव्यास

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं

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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामाजिक जीवन में महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर ही दो ऐसे विचार पुरुष हैं, जो 21वीं शताब्दी के भारत में भी सबसे अधिक प्रासंगिक हैं। कुछ प्रश्नों पर गांधी और अंबेडकर में गहरे मतभेद भी रहे, लेकिन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र में ये दोनों जमीन-आसमान की तरह बुनियादी तौर से जुड़े हुए हैं। आज भी गांधी और अंबेडकर ही अपने समाज में सबसे अधिक उपेक्षित और अपमानित भी हैं, तो इन दोनों की मूर्तियां भी सबसे अधिक लगाई और तोड़ी जाती हैं। फर्क यही है कि गांधी की सत्य और अहिंसा को स्वतंत्र भारत की जनप्रतिनिधि सरकारों ने दरकिनार किया है और अंबेडकर के सामाजिक न्याय को भी उनके अनुयायियों ने ही सबसे पहले भुला दिया है। लेकिन स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवनकाल में ही कहा था कि 21वीं शताब्दी के भारत में शुद्रों (दलितों) का राज्य होगा, तो संयुक्त राष्ट्र संघ भी अब अहिंसा के लिए अंतरराष्ट्रीय वर्ष मना रहा है। इस तरह अहिंसा और सामाजिक न्याय, दोनों ही सत्य के बिना अधूरे हैं। 

आप मानें या नहीं मानें-दरअसल सामाजिक न्याय, सत्य और अहिंसा ही हमारे लोकतंत्र में संविधान की आत्मा है और धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसी गणतंत्र की बीज संतानें हैं। दिक्कत तो यह है कि राज्य सत्ताओं की दलीय राजनीति ने हमारे सभी राष्ट्रीय महापुरुषों को और शाष्वत अध्यात्म के ज्ञान ऋषियों को अपनी चुनावी शतरंज में एक मोहरे की तरह खड़ा कर दिया है, लेकिन मन से यह राजनीति कभी गांधी और अंबेडकर को नहीं चाहती, क्योंकि विकास और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में पहली हत्या सत्य, अहिंसा और सामाजिक न्याय अर्थात् गांधी और अंबेडकर की ही होगी।

अतः आज अंबेडकर को याद करते हुए हमें सोचना चाहिए कि जिस तीन हजार वर्ष से अधिक के भारतीय समाज में जाति प्रथा ने हमारे इतिहास और पहचान को कलंकित कर रखा है, उसी जाति प्रथा (व्यवस्था) के विरोध में अंबेडकर ने अपना सब कुछ त्याग दिया था और यहां तक कि केंद्र सरकार ने विधि मंत्री का पद ही क्या, अपितु हिंदू धर्म को छोड़कर बौर्द्ध धर्म ग्रहण कर लिया था, क्योंकि उनके मन में हिंदू धर्म की चतुरवर्ग व्यवस्था सुइयों की तरह चुभती थी। आप सभी जानते हैं कि जो भारत का संविधान 1949 में स्वीकारा गया था, तब इसके लेखक और प्रारूपकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ही थे और जिसकी यह प्रारंभिक पंक्तियां कि हम भारत के लोग यह शपथ लेते हैं कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा ही हमारे लोकतंत्र का जयघोष होगा, जैसी महाकविता के सर्जक हमारे अंबेडकर ही थे। मेरा तो ऐसा मानना है कि भारत का संविधान तो प्रत्येक भारतवासी को अवश्य पढ़ना ही चाहिए, क्योंकि एक नागरिक के लिए यह गीता, कुरान और बाइबल से भी अधिक पवित्र और अनिवार्य है।

आपको यह जानकार भी आश्चर्य होगा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर महार जाति के दलित माता-पिता की 14वीं संतान थे। तत्कालीन बड़ौदा के प्रगतिशील शासक सयाजीराव ने इस प्रतिभाशाली अछूत छात्र को 25 रुपए महीने की छात्रवृत्ति दी थी और उच्च अध्ययन के लिए विदेश में पढ़ने भिजवाया था। कहने-समझने की बात केवल यही है कि एक उच्च जाति के राजा ने भी जाति को नहीं, अपितु उसी गुण और ज्ञान को महत्व दिया था, जिसके लिए संत कबीर ने 700 साल पहले कहा था कि-जात न पूछो साध की, पूछ लीजिए ज्ञान/मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।

आज भारत का यह दुर्भाग्य है कि करोड़ों की संख्या में दलित अनुसूचित जातियों के लोग गैर-बराबरी का जीवन जी रहे हैं तथा आरक्षण की वैतरणी पार करके भी दलित जातियों सामाजिक-आर्थिक असमानता के नरक में ही पड़ी है तथा जाति व्यवस्था के नाम पर तथाकथित सवर्ण संस्कृति का मैला अपने सिर पर ही ढो रही है। अंबेडकर ने मनुष्य की पीड़ा और दर्द को समझा था और यही सत्य का आग्रह था, जो गांधी से सवाल करता था और मार्क्सवाद की हिंसा को नकार कर भगवान बुद्ध की अहिंसा से उन्हें जोड़ता था।

सच बात तो यह है कि जिस तरह गाय और गंगा की संस्कृति ने भारतीय समाज में जाति और धर्म का सदियों पुराना विघटन बढ़ाया है, वैसे ही जाति व्यवस्था को समाप्त करने की जगह आरक्षण की जाति आधारित राजनीति ने अंबेडकर की सामाजिक परिवर्तन की विचार चेतना को सदैव नकारा है और इसी का यह प्रतिफल है कि तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक रामास्वामी पेरियार और अंबेडकर ही सामाजिक न्याय के लिए चुनावी महाभारत को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। पूरा भारतीय समाज विज्ञान और ज्ञान के इस युग में भी जातीय वैमनस्य, प्रभुसत्ता और संघर्ष के विग्रह में फंसा हुआ है। 

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यही तो बताया है कि-‘इस हिंदू धर्म में नियमों के कठोर पालन का विधान है। यह कानून कोई पैगम्बरों और विधिकारों ने नहीं बनाए हैं और जो जातीय संहिता बनी हुई है, वही पत्थर की लकीर है। अतः इस भेदभाव के अमानवीय धर्म को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि जाति-धर्म की असमानता को नष्ट करने का सामाजिक-आर्थिक न्याय का संघर्ष किसी भी तरह अधार्मिक नहीं है। अंबेडकर से जब किसी ने यह पूछा कि-अछूतों के लिए स्वराज क्या होगा-तब उन्होंने दुःखी मन से यही कहा था कि-तब विधायिका उदासीन होगी और कार्यपालिका उसके प्रति गूंगी-बहरी होगी।

इस प्रकार वर्तमान स्वराज के अंतर्गत अछूत उस अपमान और असमानता की स्थिति से नहीं उबर सकते, जो संकीर्ण हिंदू साम्राज्यवाद ने उन पर हजारों साल से थोप रखी है। यदि कोई सही और ईमानदार अंबेडकर के अनुयायी आज हैं, तो उन्हें यह सोचना चाहिए कि अंबेडकर को और गांधी को नए भारत के समन्वय और सामाजिक न्याय का आधार कैसे बनाया जाए, क्योंकि अंबेडकर का अभ्युदय अब कोई नहीं रोक सकता। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)