मध्य प्रदेश में लोकसभा के लिए कांग्रेस की कवायद शुरू
लेखक : नवीन जैन

स्वतंत्र पत्रकार, इंदौर (एमपी) 

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अरसा बाद कांग्रेस आला कमान ने मध्य प्रदेश में एक साहसी, दूरगामी, थकी हारी, और टूटी हुई पार्टी के ऊपर से नीचे तक नट-बोल्ट कसने वाला फैसला लिया है। राजनीति का एक मूल नियम यह भी है, कि जिस दिन हार जाओ, उसी दिन से अपने को तथा पार्टी को पराजित करने वाली स्थितियों को सिरे से सुधारने के अभियान में जुट जाओ। फिलहाल यह न मानने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता कि कांग्रेस के मध्य प्रदेश में नव नियुक्त पार्टी अध्यक्ष जीतू उर्फ़ जितेंद्र पटवारी इन्दौर की राऊ सीट से भाजपा के मधु वर्मा से करीब 35 हज़ार वोटों से हारने के बावजूद अपने उक्त नए दायित्व को निबाहने में कोई कोर कसर बाकी छोड़ेंगे। जुमले में कहा जा रहा है कि वे हारकर भी जीते हैं।

मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कह रहा है, कि राहुल गांधी से अति निकटता के कारण जीतू को इस पद से नवाजा गया। बेशक, ऐसा है भी, लेकिन कमल नाथ, और दिग्विजय सिंह से तो नेहरू परिवार की पुरानी सियासी रिश्तेदारी है। बावजूद इसके अब उक्त दोनों बुजुर्ग वार थिंक टैंक में डाल दिए गए है, जो नेता थिंक टैंक या मार्ग दर्शक मंडल में शामिल कर दिए जाते है, वो आम तौर पर भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, और डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी जैसे हो जाते है, जिन्हें खासकर तब याद किया जाता है, जब उनका जन्मदिन हो। उक्त बात कहने वाले सूत्र यहां तक कहते हैं कि उक्त दोनों दिग्गजों अपने पुत्रों  जयवर्धन सिंह, और नुकुल नाथ को नई कमान सौप देने के लिए ज़मीन तैयार कर रहे थे। 

इस काम में मीडिया का वो फुरसती हल्का भी लगा हुआ था, जिसे हरदम गलत फहमी रही है कि कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के तोप नेता जब भी पेट में वफारा आता है, तो इन्हीं मीडिया के कॉलम का चूर्ण फांककर ये दिग्गज राजनेता अपनी नई रणनीति तय करते हैं। मज़ा देखिए कि जिन कमलनाथ,और माधोगढ़ के इलाके दार (पूर्व) दिग्विजय सिंह के बिना प्रदेश कांग्रेस का पत्ता तक सालों से खड़कता भी नहीं था, उनमें से कमलनाथ से तो इस्तीफा लेने की औपचारिकता भी पूरी नहीं की गई ,और जीतू पटवारी को नए सरदार का नियुक्ति पत्र सौप दिया गया। मतलब पूरे नाटक की पटकथा परिणाम आने के साथ ही लिख ली गई थी।

जीतू पटवारी राहुल गांधी की न सिर्फ गुड लिस्ट में आते हैं, बल्कि उनके भाषणों, और कथनों से लगता है, कि उनके पास अपना भी  एक ठोस विजन है। वे जवान (50 )हैं । इसलिए कांग्रेस से नाराज़ युवा वर्ग की सोच में बदलाव ला सकते हैं। धरती पुत्र होने के कारण बुजुर्गो का साथ भी उन्हें मिल सकता है। वे अपनी पूरी ऊर्जा का इस्तेमाल सूबे में घूम कर संगठन को ज़मीनी स्तर पर मजबूत करने में सक्षम हैं। सूत्रों की माने तो ऐसे में लंबे समय से हाशिए पर छूट गए नेता जैसे अजय सिंह, अरुण यादव आदि भी सक्रिय हो सकेंगे। जीतू पटवारी को बस अति आत्म विश्वास का शिकार होने से बचना पड़ेगा, और जो देहातीपन  उनके भाषणों में यदा कदा आ जाता है, यदि वे उससे बचने लगें, तो प्रदेश के आभिजात्य वर्ग में भी कांग्रेस की पैठ हो सकती है। 

जीतू पटवारी  यदि ओबीसी से आते हैं, तो सदन में नेता प्रतिपक्ष उमर सिंह सिंधार आदिवासी वर्ग से ताल्लुक रखते है। मतलब ये कि सालों बाद कांग्रेस आला कमान ने भाजपा की तरह जातीय समीकरण को साधकर 2024के लोकसभा चुनाव में सूबे की सभी 29सीटों पर अपनी स्थिति अभी से मजबूत करनी शुरू कर दी है।वैसे भी हालिया विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के हक में कुल मतदान का भाजपा की अपेक्षा करीब आठ फीसद ज़्यादा आया है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)