किसी की चंद मिनटों की खुशी, किसी की खुदखुशी
लेखक : अतुल मलिकराम 

लेखक और राजनीतिक रणनीतिकार

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बड़े अरमानों से माता-पिता अपने बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा करते हैं। जो वो न कर सकें, उनके बच्चे कर दिखाएँ, कुछ मजबूरियों और जिम्मेदारियों के बोझ के नीचे दबे-कूचे उनके सपने उनके बच्चे पूरे करें, इसी सोच के साथ उन्हें बेहतर से बेहतर परवरिश देते हैं। बचपन से ही उनके जतन पूरे करते हैं, उनकी जिदें मानते हैं। बच्चों के सपने पूरे करने के लिए जेब में पैसा है या नहीं, तनिक चिंता नहीं करते हैं। बच्चों के चेहरे से एक क्षण के लिए भी मुस्कान ओझल न हो, इस एक चाह के लिए जी-जान लगा देते हैं।   

अपने गाँव या शहर में सुख-सुविधा न होने या फिर कम सुविधाओं के चलते अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से दूर बड़े शहरों या देशों में भेजते हैं, ताकि उनकी सुविधाओं में राई के दाने बराबर भी कमी न आए और वे पढ़-लिखकर अपने घर वापस लौट आएँ और पूरा परिवार मिल-जुलकर एक बार फिर हँसी-खुशी साथ रहने लगे। 

बेशक कुछ घरों में यह सपना बहुत ही खूबसूरती से पूरा होता हुआ दिखाई देता है, लेकिन कुछ घरों में मातम बनकर पसर जाता है। एक ऐसा मातम कि फिर वह घर ही क्या उस क्षेत्र या गाँव से ताल्लुक रखने वाला कोई भी शख्स इस सपने को देखने तक की हिम्मत भी न जुटा पाए। और वहीं वह परिवार सिर्फ यही सोच-सोचकर खुद को घूटन की आग में झोंक देता है कि आखिर बच्चे को बाहर पढ़ने भेजा ही क्यों। कम सुख-सुविधाओं में भी पढ़ाया होता, तो आज कम ही कमा रहा होता, लेकिन हमारे साथ तो होता..

टीवी या अखबार में एक खबर छपती है कि फलां गाँव या कस्बे के बच्चे ने बीती रात अपने होस्टल के कमरे में फाँसी लगा ली। और एक छात्र के साथ पूरा परिवार जीते जी खत्म.. 

बीते कुछ वर्षों में बड़े शहरों में जाकर कोचिंग इंस्टीट्यूट्स जाकर सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने के सिलसिले ने भी जोर पकड़ा है। यहाँ कई अन्य राज्यों और संस्कृतियों से आए लोगों के बीच रहना, खाना-पीना, पढ़ना और अपना दैनिक जीवन जीना एक बहुत बड़ा चरण होता है। इस बीच कई बच्चे अनजानों के बीच असहज महसूस करते हैं या फिर जाने-अनजाने में किसी की छेड़छाड़ या शोषण आदि का शिकार हो जाते हैं। 

कुछ समय पहले एक बच्चे की आत्महत्या की खबर टीवी पर चलते देख एक पिता की धड़कनें बढ़ गईं और उन्होंने सोचा कि अपने बच्चे का भी हालचाल ले लिया जाए। दरअसल बच्चा अपने गाँव से दूर एक बड़े शहर में पढ़ने गया था। बच्चे द्वारा फोन नहीं उठाए जाने पर क्या कुछ विचार नहीं आ गए होंगे उस पिता के दिमाग में.. कुछ समय बाद होस्टल से खबर आती है कि आपके बच्चे ने फाँसी लगा ली। जब उसे पता चला होगा कि जिस बच्चे की खबर वह टीवी में देख रहा है, वह उसी का बच्चा है, आप सोचिए कि उसके जिगर के कितने टुकड़े हो गए होंगे। 

यह किसी एक पिता की कहानी नहीं है, ऐसे कई माता-पिता बच्चों द्वारा आत्महत्या के खौफनाक कदम उठाने के चलते जीते-जी सूली चढ़ जाते हैं। 

बच्चों द्वारा आत्महत्या किए जाने के कारणों पर जितनी बात की जाए कम ही है। फिर एक तथ्य यह भी है कि बड़े शहरों में पढ़ाई के नाम पर बेहतरी कम और चोचले अधिक होने लगे हैं। बड़े शहरों में जाकर पढ़ाई करने के नाम पर हाई सोसाइटी का स्टेटस, ऊँचे घराने का दिखावा और शान-ओ-शोहकत जहाँ कई बच्चों के सिर चढ़कर बोलते हैं, वहीं कुछ बच्चे खुद को इसमें असहज और दूसरे बच्चों से खुद को पिछड़ा हुआ पाते हैं। अकेलेपन का शिकार इन बच्चों को जीवन की बलि चढ़ा देने के अलावा कुछ भी उचित नहीं लगता। 

वे कई बार पेरेंट्स को बताते हैं कि उनका यहाँ मन नहीं लग रहा या बड़े शहर के तौर-तरीके और पढ़ाई उन्हें समझ नहीं आ रही, लेकिन पेरेंट्स कुछ भी समझ नहीं पाते। हालाँकि, यहाँ बच्चे में भी उतनी हिम्मत होना जरुरी है कि वह खुलकर अपनी समस्या या आपबीती अपने पेरेंट्स को बताए। लेकिन होता इसका उल्टा है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे इस बात को गंभीरता से लें, यह कतई न सोचें कि कुछ महीनों में वह बड़े शहर में ढल जाएगा। यदि उसका मन नहीं लग रहा है, तो पहली फुर्सत में उसे अपने पास बुला लें, उसे बताएँ कि आप उसके साथ हैं। छोटे शहर में पढ़ाई करके भी बेहतर जीवन जीया जा सकता है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)