प्रोग्रेसिव के लिए एड्जेस्ट एवरीवेयर बने

लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़ 

पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान

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एड्जेस्ट एवरीवेयर का तात्पर्य है। प्रत्येक परिस्थिति में हर जगह अपने को मिला लेना। जो व्यक्ति इस कला को जानता है, जीवन में उसकी हार नहीं होती। मानव परिवार से लेकर राष्ट्र तक अपने सम्बन्धों को बनाता है। परिवार में अनेक सदस्य होते है। सब की रुचि और सबका मिजाज अलग-अलग होता है। कोई उग्र स्वभाव का होता है तो कोई नम्र स्वभाव का। सभी को एक साथ रहने के लिए तालमेल बैठाना आवश्यक होता है। परिवार में एड्जेस्ट करने के लिए बड़ों का सम्मान करना पड़ता है। बड़ों का भी यह कत्र्तव्य है कि वे छोटों को आदर दे और उनके प्रति स्नेह का भाव रखे। जहां आवश्यक हो उन्हें सुझाव देकर अपनी बात को उनके सामने रखे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मानव को एक दूसरे के साथ तालमेल बैठाना होता है। यह शिक्षा परिवार से ही प्रारंभ हेाती है। परिवार को नागरिकता की प्रथम पाठशाला कहा जाता है। बालक को माता-पिता और अन्य पारिवारिकजन जो कुछ भी शिक्षा देते हैं उसी के अनुरूप बालक के चरित्र का निर्माण होता है। शिक्षा, खेल एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के साथ सम्बन्ध एड्जेस्टमेंट के हिसाब से ही होता है। 

जब बच्चा विद्यालय में पढ़ने के लिए जाता है तो वहां अनेक वस्तुओं से उसका सम्पर्क होता है। धीरे-धीरे बच्चा सभी के साथ एड्जेस्टमेंट करके रहना सीखता है और पढ़ना सीखता है। धीरे-धीरे यह भावना और आगे बढ़ती है और वह सबके साथ घुल-मिल जाता है। कोई भी खेल हो जब उस खेल को टीम भावना से खेला जाता है तो वियजश्री अवश्य मिलती है। यदि खिलाड़ियों तालमेल न हो तो खेल को जीतना बड़ा मुश्किल हो जायेगा। क्रिकेट के मेच में दो देश जब आमने-सामने प्रतिद्वन्द्वी के रूप में क्रिकेट खेलते है तो हर दल को बहुत ही एड्जेस्टमेंट करना पड़ता है। इसी प्रकार सभी खेलों में इस भावना का होना आवश्यक है। एड्जेस्टमेंट के बढ़ने से दृष्टिकोण विधेयात्मक बनता है और जिस व्यक्ति का विधेयात्मक दृष्टिकोण रहता है वहीं आगे बढ़ता है। 

यदि महाभारत के प्रसंग में देखा जाये तो भगवान श्रीकृष्ण ने कौरव और पाण्डव दोनों पक्षों में एड्जेस्टमेंट कराने का बहुत प्रयास किया। किन्तु दुर्योधन के निषेधात्मक दृष्टिकोण के कारण यह संभव न हो सका। इसका परिणाम यह हुआ कि युद्ध अवश्यंभावी हो गया और इस युद्ध का परिणाम सबके सामने है। फलतः कौरवों का विनाश हुआ। निषेधात्मक दृष्टिकोण विनाश को बुलावा देता है और रचनात्मक दृष्टिकोण उन्नति प्रदान करता है। महान् व्यक्तियों का व्यक्तित्व सदैव रचनात्मक होता है। वे विवाद नहीं करना चाहते। यदि कोई उन्हें अपशब्द भी कह दे तो वे उसका प्रतिकार नहीं करते। विवाद तब होता है जब अहंकार टकराता है। 

अहंकार की लड़ाई में सब कुछ नष्ट हो जाता है। दो पक्षों में जब विवाद होता है तो दोनों न्यायालय की शरण में जाते है। विवाद के पहले यदि दोनों पक्ष बैठकर आपस में समझौता कर लें तो उन्हें न्यायालय में न जाना पड़े और एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ना न पड़े, धन का नुकसान न हो। जो धन अनावश्यक रूप से न्यायालय में जाने से खर्च हो रहा है उसको किसी रचनात्मक कार्य में यदि लगाया जाये तो उससे विकास होगा। न्यायालय भी यही कार्य करता है। दोनों के गुण और दोष के अनुसार दण्ड और पुरस्कार देता है और दोनों पक्षों को स्वीकार करना पड़ता है। 

यदि दोनों पक्ष बैठकर  संतोष धारण करके आपस में समझौता कर लें तो किसी को न तो नुकसान होगा न फायदा। जिसको जो मिलना चाहिए वह मिल जायेगा। प्रकृति भी एड्जेस्ट एव्रीह्येर की शिक्षा मानव को देती है। प्रकृति पंचभूतात्मक है। यदि पांचों तत्व आपस में न मिले तो सृष्टि का बनना असंभव है, किन्तु ऐसा होता नहीं। जैसा एड्जेस्टमेंट प्रकृति में है यदि वैसा ही हर जगह हो तो कही विवाद नहीं होगा। पांचो तत्वों के एड्जेस्टमेंट का परिणाम है यह भौतिक संसार। सभी तत्व सभी तत्वों में मिले हुए है। जिसकी जितनी मात्रा होनी चाहिए उसी के अनुसार उनका मिश्रण हो जाता है और प्रकृति में तालमेल बना रहता है। मानव प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करके प्रकृति के स्वरूप को विकृत कर रहा है। जिसका परिणाम है प्रकृति का प्रकोप। कही पर अतिवृष्टि हो रही है तो कहीं पर अनावृष्टि। कहीं पर सुनामी आ रही है तो कहीं पर भूकम्प। ऐसा इसलिए हो रहा है कि मानव प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर नहीं चल रहा है। मानव को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा यही प्राथमिक आवश्यकता है। किन्तु मानव आवश्यकता से अधिक प्रकृति का दोहन कर रहा है। 

इच्छाएं आकाश के समान अनन्त होती है। सभी इच्छाओं को पूर्ण नहीं किया जा सकता। यदि इच्छाओं को पूरा किये जाने का प्रयास किया जायेगा तो दूसरी इच्छा सामने आ जायेगी। इसी तरह इच्छाएं बढ़ती जायेगी। इनका पूरा होना असंभव है। यदि प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बैठाया जायेगा तो मानव का भी विनाश निश्चित है। किसी को क्रूध करके उससे कोई चीज प्राप्त नहीं की जा सकती। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर प्रकृति का उपयोग किया था। उस समय प्रकृति के हर अवयव की पूजा होती थी। भारतीय शास्त्रों में प्रकृति पूजा के अनेक उदाहरण मिलते है। एड्जेस्टमेंट की शिक्षा परिवार से प्रारंभ होती है और गुरुओं आचार्यों से होते हुए सत्संग तक जाती है। जब हम गुुरु के सान्निध्य में बैठकर ज्ञान प्राप्त करते है तो वहां हमें सबसे पहले सभी के साथ प्रेमपूर्वक रहने की ही शिक्षा दी जाती है। यही जीवन का मूलमंत्र है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)