हां मैं दादी जैसी दिखती हूँ ...

प्रेरणा अरोड़ा सिंह की कलम से 

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कोविड-19 महामारी के लॉक डाउन ने सब कुछ बदला। इंसान ने अपने आपको घर की दहलीज़ के अंदर बदलते हुए जीवन के अंश लिखना, बड़ों से सीखना या अपनी पसंद के पकवान बनाना सीखना और घर की परिधि में क्या कुछ नया कर सकते हैं जैसे कार्य किए। प्रेरणा अरोड़ा ने भी घर में रहते हुए लेखन शुरू किया। सबसे पहले लिखा गया यह अनुभव वे आप सब से साझा कर रही हैं :   

बिना कुछ कहे मुझे गले लगा कर चली जाती हो

दादी को गए हुए पूरे अट्ठारह साल हो गए है

पर लगता है जैसे वह हर पल साथ ही रहती है

बचपन में हमेशा कहती थी की मेरे से कुछ काम सीख लो

बाद में याद करोगी पर तब कोन सुनता था

लगता था कि दादी बहुत परेशान करती है बेवजह टोकती रहती है

पर आज अट्ठारह साल बाद भी तुम बहुत याद आती हो

सच कहती थी जो भी कहती थी

माना कि सब कुछ तो ना सीख पाई तुमसे पर जितना भी सीखा वो बहुत काम आता है और गर्व भी महसूस होता है जब लोग काम की तारीफ करते है

मेरी जिंदगी के पहले सबक तुमने ही तो सिखाये थे 

खाना बनाना हो या बाजार से सामान लाना हो या फिर पूजा पाठ करना हो यहाँ तक की गीताजी का पाठ भी तो तुमने ही पढ़ाया था सच में आज बहुत काम आता है ये सब

वो दिन भी क्या दिन थे जब हम हर साल दिवाली की छुट्टियों में हरिद्वार जाते थे और गंगा माता की आरती देखते थे बहुत साल बाद जब वहां गयी तो तुम्हारी हर याद मन में ताजा हो गयी

यहाँ तक की जीवन में पहली बार किसी को इस संसार से विदा होते हुए भी तो तुम्हे ही देखा था कितना गुस्सा हुई थी तुम मुझपे उस दिन 

पापा से कितनी शिकायत भी की थी की अपनी बेटी को समझा दे ज्यादा डॉक्टरनी ना बने और फिर कुछ देर बाद मेरी ही गोद में सिर रख कर हमेशा के लिए शांति से सो गयी थी ना तुम 

फिर हर साल जो दो बार मेरे सपनों में आती हो और बिना कुछ कहे मुझे गले लगा कर चली जाती हो क्या उस दिन का बचा हुआ प्यार है जो देने आती हो? 

मेरे दोस्त मुझे बोलते है कि मेरे मन में जो विचार आते है उन्हें मैं कागज़ पर उतारू पर कभी ना लिख सकीं

लो आज पहली पातीं लिख दी है वो भी तुम्हारे नाम की

जब तक हम दोबारा ना मिल पाए तुम यूँ ही आती रहना मेरे सपनों में अपना प्यार लुटाने को... 💕💕💕