लोकतंत्र में 'मानवाधिकार' गरिमा और आत्म सम्मान के लिए आवश्यक

मानवाधिकार दिवस 2020: "बेहतर पुनर्प्राप्त करें-मानव अधिकारों के लिए खड़े हों" मानवाधिकार दिवस 2020: इस वर्ष का मानवाधिकार दिवस दलित-वंचित लोगों, बच्चों और महिलाओं पर कोविड-19 महामारी के विनाशकारी नतीजों पर केंद्रित है और "मानव अधिकारों को पुनर्प्राप्ति प्रयासों के लिए केंद्रीय सुनिश्चित करके बेहतर वापस बनाने की आवश्यकता है। 


लेखक : कमलेश मीणा

सहायक क्षेत्रीय निदेशक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, इग्नू क्षेत्रीय केंद्र जयपुर, राजस्थान।

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मानवाधिकारों के मामले में किसी को भी पीछे नहीं छोड़ा जा सकता। यह लोकतांत्रिक प्रणाली के मूल्यों की समीक्षा, आत्मनिरीक्षण और विश्लेषण का समय है। मानवाधिकार दिवस हमें हर व्यक्ति के लिए हमारी संवैधानिक जवाबदेही और जिम्मेदारी के बारे में याद दिलाता है। शोध के आंकड़े कहते हैं कि अधिकतम क्रूरता, क्रूरता, भेदभाव, अन्याय, असमानता, जातिवाद, रंगवाद, क्षेत्रवाद, धार्मिक, भाषाई अपमान हमारी न्यायपालिका, प्रशासन, निर्वाचित सरकारों और अधिकारियों द्वारा विभिन्न स्तरों पर और अलग-अलग समय पर भारत के निवासियों के साथ किया जा रहा है। विभिन्न तरीकों और दिमागों के साथ। इस दिशा में बहुत सी चीजें करने की आवश्यकता है जो हर व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं और जमीनी वास्तविकताएं बहुत विपरीत हैं और जमीनी स्तर पर स्थितियां गंदी, दयनीय, ​​गंभीर, गैर संवेदनशील हैं। हमें इन मुद्दों को प्राथमिकता के आधारों पर हल करने की आवश्यकता है। हमारी न्यायपालिका, प्रशासन, संसद सदस्य, विधानसभा सदस्य, निर्वाचित प्रतिनिधि, शिक्षक, डॉक्टर, पुलिस अधिकारी, नौकरशाह पूरी तरह से समझदार, संवेदनशील और मानवाधिकार रक्षक होने चाहिए। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित सभी 30 मानवाधिकारों से परिचित होने के लिए मानव अधिकारों को हमारे शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत बहु भाषाई, बहु सांस्कृतिक और बहु ​​धार्मिक बहुलतावादी समाज के साथ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है। दुर्भाग्य से, कुछ ताकतें लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करती हैं और असंवैधानिक गतिविधियों में लिप्त हैं। परिणामस्वरूप, कुछ लोगों का वर्ग अपने अधिकारों से वंचित है और अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा पा रहा है। मानवाधिकार शिक्षा न केवल छात्रों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक कर सकती है, बल्कि दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने में भी मदद कर सकती है। मानवाधिकार मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के सम्मान के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित कराता है। आज मानवाधिकार की जो परिष्कृत एवं विस्तारवादी अवधारणा हम देखते हैं उसके जड़ में "जियो और जीने दो" की मूल अवधारणा शामिल है। समाज के हर व्यक्ति को जीने का अधिकार है, तो समाज के हर व्यक्ति का भी कर्तव्य है कि वह अन्य के जीवन में बाधक न बने। 

यह मानवाधिकार की मौलिक अवधारणा है। 10 दिसंबर को मनाया जाता है, मानवाधिकार दिवस मानव अधिकारों के लिए जारी संघर्ष, इन्सानी अधिकारों की पहचान और वजूद को अस्तित्व में लाने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस (यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स डे) मनाया जाता है। मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों-सितम को रोकने और अमानवीय कृत्यों के खिलाफ संघर्ष की आवाज को मुखर करने में इस दिवस की महत्वूपूर्ण भूमिका है। मानव अधिकार जो कि प्रकृति ने मानव को जन्म के समय उपहार स्वरूप प्रदान किये इन मानव अधिकारों को कभी-कभी मूलभूत अधिकार, आधारभूत अधिकार, अन्तर्निहित अधिकार, प्राकृतिक अधिकार और जन्मसिद्ध अधिकार भी कहा जाता है। ये अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए नितांत आवश्यक हैं क्योंकि ये मानव की गरिमा एवं स्वतंत्रता के अनुरूप है तथा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक और भौतिक कल्याण के लिए आवश्यक हैं। इन अधिकारों की अनुपस्थिति में मानव कभी भी किसी प्रकार का विकास नहीं कर सकता।

भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। दुनिया में जब कोई इंसान पैदा होता है तो उसे कुछ अधिकार खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। दुनिया में आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ रहना इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे अपने अधिकारों का पता हो या न हो लेकिन समाज और सरकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे उसके मानव होने के अधिकारों की रक्षा करें। अगर कोई वंचित है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे हमेशा वंचित ही रखा जाए। इस अवसर पर दुनियाभर के 48 देश संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में एक साथ होंगे। यह मानवता के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोकने का एक वैश्विक प्रयास है। 86 फीसदी को नहीं पता उनके अधिकार: ये अधिकार हर मनुष्य को जन्म से प्राप्त हैं। दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को इन अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। 

लेकिन भारत में जो आंकड़े आए हैं वह बेहद चौंकाने वाले हैं। एक संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 86 फीसदी लोग अपने अधिकार नहीं जानते हैं। संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में सबसे ज्यादा बुजुर्गों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। जिन बुजुर्गों के साथ अत्याचार होता है उनमें अधिक संख्या में छोटे परिवारों से हैं। जिन्हें सिस्टम से संपर्क साधने संबंधित कोई जानकारी नहीं है। संस्था ने इस अध्ययन में पांच हजार लोगों को शामिल किया है। शहरों में हालात सबसे अधिक खराब जहां शहरों में साक्षर लोगों का आंकड़ा गांवों के मुकाबले अधिक माना जाता है। वहीं रिपोर्ट में कुछ और ही बात सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी इलाकों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। 

यहां 23 फीसदी लोग अमानवीय परिस्थिति में रहने को मजबूर हैं। वहीं 13 फीसदी लोगों का कहना है कि उन्हें उनकी उम्र के मुताबिक उचित भोजन नहीं मिलता है। अध्ययन के अनुसार देश में 68.8 फीसदी लोगों को जरूरी दवाएं और स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। जागरुकता की कमी: रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि सर्वेक्षण में शामिल आधे लोगों का कहना है कि उनके साथ होने वाले भेदभाव और अपमान का कारण उनकी बढ़ती उम्र है। जो लोग इन अधिकारों से अंजान हैं उनमें अधिकतर की आयु 60-70 साल के बीच है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि मानवाधिकारों के बारे में जागरुकता की कमी है। 

बच्चों की स्थिति के मामले में 116वें नंबर पर भारत,बच्चों की बेहतर स्थिति पर किए गए एक अध्ययन में 172 देशों को शामिल किया गया था। जिसमें भारत का नंबर 116वां है। हैरान करने वाली बात ये है कि इस मामले में श्रीलंका (61वां), भूटान (93वां) और म्यांमार (112वां) की स्थिति भारत से बेहतर है। वहीं नेपाल (134वां), बांग्लादेश (134वां) और पाकिस्तान (148वें) की स्थिति भारत से काफी खराब है।भारत में 3.1 करोड़ बच्चे और अव्यस्क बाल मजदूरी में लगे हुए हैं। ये आंकड़ा दुनिया के किसी भी देश से अधिक है। इनकी उम्र 4-18 साल के बीच है। वहीं 4.8 करोड़ बच्चों को जरूरत के मुताबिक भोजन नहीं मिल पा रहा है।

मानवाधिकार कानून भारत में मानवाधिकार कानून 28 सितंबर, साल 1993 को अमल में आया था। इसके बाद अक्तूबर, साल 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया। पहली बार विश्व मानवाधिकार दिवस की घोषणा 10 दिसंबर, साल 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने की थी। संयुक्त राष्ट्र असेंबली ने ये घोषणा विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी करने के बाद की। कानून द्वारा संरक्षित इन अधिकारों का प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से हकदार है। मानवाधिकार दिवस 2020: थीम है "बेहतर पुनर्प्राप्त करें-मानव अधिकारों के लिए खड़े हों" मानवाधिकार दिवस 2020: इस वर्ष का मानवाधिकार दिवस दलित-वंचित लोगों,बच्चों और महिलाओं पर COVID-19 महामारी के विनाशकारी नतीजों पर केंद्रित है और "मानव अधिकारों को पुनर्प्राप्ति प्रयासों के लिए केंद्रीय सुनिश्चित करके बेहतर वापस बनाने की आवश्यकता है "। हर साल मानवाधिकार दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित दिवस 10 दिसंबर को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र राष्ट्रों को "सभी के लिए समान अवसर बनाने" के लिए प्रोत्साहित करता है और असमानता, बहिष्करण और भेदभाव के मुद्दों को संबोधित करता है। मानवाधिकार दिवस हमारे समुदायों में मानव अधिकारों के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाने और महामारी के बाद पुनः निर्माण में विश्वव्यापी एकजुटता का एक बड़ा अवसर है।

मानवाधिकार दिवस 2020: थीम: "रिकवर बेटर - ह्यूमन राइट्स के लिए स्टैंड अप" इस वर्ष मानवाधिकार दिवस का विषय है। उद्देश्य सभी हितधारकों और भागीदारों के साथ जुड़ना है और परिवर्तनकारी कार्रवाई के लिए लोगों को शामिल करना है। 1948 में मानवाधिकार दिवस लागू हुआ जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को अपनाया। यह 500 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध है और दुनिया में सबसे अधिक अनुवादित दस्तावेज़ भी है। भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। दुनिया में जब कोई इंसान पैदा होता है तो उसे कुछ अधिकार खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। दुनिया में आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ रहना इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे अपने अधिकारों का पता हो या न हो लेकिन समाज और सरकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे उसके मानव होने के अधिकारों की रक्षा करें। अगर कोई वंचित है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे हमेशा वंचित ही रखा जाए। 

साल 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी किया था। इस घोषणा पत्र के जरिए विश्व का ध्यान इंसान के अच्छे तरीके से जिंदगी गुजारने की ओर दिलाया गया। वर्ष 1950 में संयुक्त राष्ट्र ने 10 दिसंबर की तारीख को हर साल विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में तय किया।मानवाधिकार को अगर प्रकृति प्रदत्त अधिकार कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि किसी भी इंसान का आजादी,बराबरी और सम्मान के साथ रहना मानवाधिकार है। अगर मानव के इन अधिकारों में किसी प्रकार की बाधा आती है तो उसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। क्या है मानवाधिकार हर मनुष्य को मिले जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान के अधिकार को ही मानवाधिकार कहा जाता है। ये अधिकार किसी भी मनुष्य को राष्ट्रीयता, लिंग, रंग, धर्म, भाषा और किसी भी आधार पर बिना भेदभाव के मिलते हैं। 

वहीं भारतीय संविधान भी इस अधिकार की न केवल गारंटी देता है बल्कि इन अधिकारों की अवहेलना करने वालों को अदालत सजा भी सुनाती है। भारत में मानवाधिकार कानून 28 सितंबर, साल 1993 को अमल में आया था। इसके बाद अक्तूबर, साल 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया। पहली बार विश्व मानवाधिकार दिवस की घोषणा 10 दिसंबर, साल 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने की थी। संयुक्त राष्ट्र असेंबली ने ये घोषणा विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी करने के बाद की। कानून द्वारा संरक्षित इन अधिकारों का प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से हकदार है।

मानवाधिकार मानवता और सम्मान का अनिवार्य हिस्सा है और यह सभी के लिए है इससे किसी को भी वंचित नहीं किया जा सकता है। हमारे लोकतंत्र में सवाल उठ रहे हैं कि हम मानवाधिकारों को अपने समाज का अभिन्न अंग क्यों नहीं बना सकते? हम मानवाधिकारों, मानवीय गरिमा और सम्मान की रक्षा करने में अब तक क्यों असफल रहे? हम अपने शिक्षा पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में मानवाधिकार क्यों नहीं बना सके? जाति, धर्म, लिंग, लैंगिक, नस्ल, रंग, भाषा, संस्कृति और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव हमारे लोकतंत्र में मौजूद हैं क्योंकि हम समाज के रूप में हैं? हमारे लोगों को मानवाधिकार नहीं देने के लिए कौन जिम्मेदार है?

मैं आपको इस आशा के साथ अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस की शुभकामना देता हूं कि हम हर व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखने में सक्षम होंगे और किसी के साथ कोई भेदभाव किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा आगामी दिनों में हमारी चुनी हुई सरकारों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और इससे किसी को इनकार नहीं किया जाएगा। (लेखक के अपने विचार हैं)